फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   35 percent literary theft and forgery in MPhil and PhD

एमफिल और पीएचडी में 35 फीसदी साहित्यिक चोरी और फर्जीवाड़ा 

Thu, 01 Aug 2019 09:58 PM IST
राजेश सैनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राजेश सैनी Updated Thu, 01 Aug 2019 09:58 PM IST
सार

-यूजीसी कमेटी की रिपोर्ट में खुलासा, शोधार्थियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी पर शोध में गिरावट 
-एमफिल और पीएचडी में राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा से दाखिले का सुझाव, कुलपति नियुक्ति पर सवाल 

विज्ञापन
35 percent literary theft and forgery in MPhil and PhD
सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

एमफिल और पीएचडी के शोध में 35 फीसदी साहित्यिक चोरी (प्लैजरिजम) और फर्जीवाड़ा (डाटा मनिप्यलैशन) होता है। यह खुलासा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कमेटी की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में लिखा है कि वर्ष 2010 से 2014 तक सबसे अधिक फर्जी जनरल में शोध प्रकाशित होते रहे। बेशक, पीएचडी छात्रों की संख्या में इजाफा हो रहा है, लेकिन शोध की गुणवत्ता में गिरावट आई है। कमेटी ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि एमफिल और पीएचडी में शोध की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इन दोनों प्रोग्राम में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए। इसके अलावा विश्वविद्यालयों के प्रमुख यानी, कुलपति की नियुक्ति के दौरान अच्छी अकेडमिक परख वाले को तवज्जो दी जाए। क्योंकि, कुलपति की अध्यक्षता में ही शोधकार्यों पर काम होता है। 

विज्ञापन


आईआईएससी बंगलूरू के पूर्व निदेशक व प्रो. पी बलराम की अध्यक्षता में यूजीसी ने कमेटी गठित की थी। कमेटी ने रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंप दी है। रिपोर्ट के साथ एमफिल व पीएचडी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए दाखिले से लेकर शोधकार्यों में सुधार के लिए सुझाव भी दिए हैं। आयोग ने कमेटी की रिपोर्ट व सुझावों को राज्यों समेत विश्वविद्यालयों से साझा करते हुए सुझाव आमंत्रित किए हैं। 
विज्ञापन


रिपोर्ट में लिखा है कि एमफिल और पीएचडी में साहित्यिक चोरी (प्लैजरिजम) और फर्जीवाड़ा (डाटा मनिप्यलैशन) भारतीय संस्थानों के लिए खतरे की घंटी है। छात्र साहित्यिक चोरी (प्लैजरिजम) और फर्जीवाड़ा (डाटा मनिप्यलैशन) के माध्यम से अपने शोधकार्यों को पूरा करके डिग्री प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे शोधार्थियों का मकसद सिर्फ डिग्री हासिल करके विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में नौकरी प्राप्त करना है। यदि ऐसे शोधार्थी शिक्षक बनते हैं तो संस्थानों के भविष्य पर सवालिया निशान लगता है। 2010 से 2014 के बीच सबसे अधिक शोध प्रकाशन में सबसे अधिक फर्जीवाड़ा हुआ है। एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से 2015 तक करीब 11 हजार शोध फर्जी जनरल में प्रकाशित हुए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


छात्रों की संख्या दोगुनी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 -11 से एमफिल और पीएचडी कोर्स में शोधार्थियों की संख्या दोगुनी हुई है। वर्ष 2010-11 में पहले आंकड़ा 77798 था, जो 2017-18 में 161412  पार कर गया। कमेटी ने शोध प्रकाशन की गुणवत्ता में सुधार के लिए देखभाल का सुझाव दिया है। कमेटी ने महिलाओं व दिव्यांगों को शोधकार्यों से जोड़े के लिए अलग से सुझाव दिए हैं। इसके अलावा शिक्षकों को किताब लिखने या विभिन्न विषयों पर शोधकार्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। इसमें उन्हें आर्थिक रूप से मदद करना भी शामिल है। सभी सेंट्रल, स्टेट, डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी मिलकर शोधकार्यों पर काम करें। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के साथ स्थानीय समस्याओं पर शोध को तवज्जो देने पर जोर दिया है। शोध को बढ़ावा देने के लिए प्रति विश्वविद्यालय शिक्षक को 50 से 100  छुट्टी देने की भी सुझाव है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed