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84 के दंगा पीड़ितों को नहीं मिला आज भी मुआवजा, जिंदा आग में झोंक दिया था पूरा परिवार

Thu, 30 Jun 2016 05:39 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजला, नई दिल्ली Updated Thu, 30 Jun 2016 05:39 PM IST
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32 years after sikh riot: they called my family out of house and burnt them alive
स‌िख दंगों के दौरान इसी ख‌िड़की से गुरप्रीत ने अपने पर‌िवार के सदस्यों को एक-एक कर जलते देखा था - फोटो : indian express

गुरप्रीत सिंह ने जब अपने माता-पिता, दो भाइयों, चाची और भतीजे को भीड़ द्वारा जिंदा जलाते हुए देखा था, तब वह सिर्फ 16 साल के थे। गुरप्रीत के लिए वो कभी न भूलने वाली काली तारीख थी 2 नवंबर, 1984।

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गुरप्रीत के परिवार के ये छह ‌जिंदा जलाए गए सदस्य गुड़गांव और पटौदी के उन लोगों में शामिल थे, जिन्हें सिख विरोधी दंगों में मार दिया गया। ऐसे ही परिवारों के लिए जस्टिस टी.पी. नारंग कमीशन ने मुआवजे के तौर पर 12.07 करोड़ रुपए की सिफारिश की है।
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1984 के उस भयानक दिन को याद करते हुए गुरप्रीत बताते हैं कि, उस दिन जब भीड़ गुड़गांव के बादशाहपुर पहुंची, उनके पड़ोसियों ने उन्हें अपने घर में छिपा दिया। उन्होंने एक खिड़की से सबकुछ होते हुए देखा।
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गुरप्रीत ने बताया कि कम से कम ‘एक हजार’ लोगों की भीड़ ने उनके परिवार के घर के सामने स्थित गुरुद्वारे को आग लगा दी, उसके बाद गुरप्रीत के परिवार की ओर रुख किया।

घर को जलाया फ‌िर घरवालों को भी ज‌िंदा जला द‌िया

32 years after sikh riot: they called my family out of house and burnt them alive
1984 के दंगों की तस्वीरें

गुरप्रीत सिख विरोधी दंगों का वो दौर याद करते हुए बताते हैं कि, कुछ लोग उनके परिवार से बाहर निकलने को कहने लगे, उन्‍हें इस बात का भरोसा दिलाने लगे कि कोई नुकसान नहीं होगा। गुरप्रीत का बड़ा भाई जैसे ही नीचे पहुंचा, उन्‍होंने उसे घेर लिया और जिंदा जला दिया।

उसके दूसरे भाई को भी नीचे बुलाया गया था और जब उसने भागने की कोशिश की तो भीड़ ने उसे पकड़ कर पीटा और जिंदा जला दिया। कुछ हमलावरों ने उसकी उंगलियां भी काट दी थीं।

गुरप्रीत अपना दर्द बयां करते हुए आगे कहते हैं कि, भाईयों को जलाने के बाद हमलावरों ने उनके घर को भी आग लगा दी, जिससे सबको बाहर आना पड़ा और फिर उन्‍होंने उन्‍हें जिंदा जला दिया।

बता दें कि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों में बच निकले अन्‍य लोग भी हिंसा, लूट, बलात्‍कार और हत्‍या की ऐसी ही दिल दहला देने वाली कहानियां सुनाते हैं।

'दंगों में लूट ल‌‌िए गए हमारे मकान'

32 years after sikh riot: they called my family out of house and burnt them alive
स‌िख दंगों की त्रासदी

1984 के सिख विरोधी दंगों ने पूरे देश में हिंसा और मौत का तांडव कराया। गुड़गांव में 47 और पटौदी में 17 लोग मारे गए। इसके अलावा जीवित बचे लोगों का आरोप है कि पटौदी में 21 व्‍यापारिक संपत्त‍ियों (फैक्‍ट्री आदि) को आग लगा दी गई। पटौदी के 35 सिख परिवार दंगे से प्रभावित हुए।

गुड़गांव के करीब 300 घर जला दिए गए। दंगों में बचे लोग कहते हैं कि जब राहत और देखभाल के लिए उन्‍हें रिफ्यूजी कैंप में ले जाया गया, तब भी उनका डर कम नहीं हुआ।

सुरिंदर सिंह जो दंगों के वक्‍त 42 साल के थे उनका कहना है कि, 'वो हमें शरणार्थी शिविर ले गए और वहां छोड़ दिया। वहां ना तो खाने-पीने का कोई इंतजाम था ना ही शौचालय का। हम खुद ही अपना सामान खरीदकर अपना खाना बनाते थे।'

दंगों के दौरान जो लोग अपना घर सही सलामत छोड़ गए थे उनका आरोप है कि वापस लौटने पर उन्हें अपने घर में तोड़फोड़ मिली थी। उनका फर्नीचर, ज्‍वेलरी, बर्तन, चादर जैसे जरूरी सामान भी चोरी हो चुके थे। इन परिवारों का तो ये भी आरोप है कि कई मामलों में अधिकारियों ने मौतों को मानने से इनकार कर दिया और FIR तक दर्ज नहीं की।

'हमारा जो हक है उतना मुआवजा ‌म‌िले'

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स‌िख व‌िरोधी दंगों की त्रासदी

दंगों में पीड़ित कई परिवारों का एक ही आरोप है, '47 और 17 तो सिर्फ अधिकारिक आंकड़े हैं, कई ऐसे हैं जिनकी मौत मानी ही नहीं गई। 1984 में पटौदी गांव में 35 सिख परिवार रहते थे, आज वहां सिर्फ 10 घर हैं।'

गुड़गांव और पटौदी के सिख परिवार कहते हैं कि 1984 दंगों के अत्‍याचार की तस्‍वीरें अभी तक उनके जेहन में ताजा हैं, मगर वे उम्‍मीद नहीं करते कि ज्‍यादातर दंगाई कभी पकड़े जाएंगे और उन्‍हें सजा होगी।

उन्‍होंने जो खोया है, वे उसके मुआवजे की मांग करते हं। उन्‍हें लगता है कि कई सरकारों और अदालतों ने उन्‍हें जो ऑफर किया है, वह ‘अपर्याप्‍त’ है। एक सर्वाइवर ने कहा, हम वही मुआवजा चाहते हैं जिसके हम हकदार हैं। एक लोकतांत्रिक देश में, हम अभी भी लोकतंत्र का इंतजार कर रहे हैं।

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