उत्तराखंड: डिजिटल लेनदेन में गड़बड़ी पर वित्त निदेशक के जवाब से संतुष्ट नहीं हाईकोर्ट
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उत्तराखंड में डिजिटल माध्यम से वित्तीय लेनदेन के लिए अधिकृत कंपनी की ओर से की जा रहीं गड़बड़ियों के मामले में वित्त निदेशक के जवाब से हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने उन्हें दोबारा शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 मार्च की तिथि नियत की है। शपथपत्र में वित्त निदेशक ने यह नहीं बताया कि टेंडर प्रक्रिया कब की गई, इसे समाचारपत्रों में कब निकाला गया और कितनी बिडे आईं।
मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की खंडपीठ के समक्ष देहरादून की आरटीआई कार्यकर्ता सीमा भट्ट की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता का कहना था कि कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के निर्देशों के क्रम में राज्य सरकार ने शुरू में डिजिटल लेनदेन एनआईसी के माध्यम से किया था। बाद में इसके लिए टेंडर निकला गया। जिस कंपनी के नाम टेंडर हुआ वह ब्लैकलिस्ट हो गई। इसके बाद पुन: टेंडर और अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बजाय सरकार ने एक अन्य कंपनी को यह काम सौंप दिया।
कंपनी को नहीं इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग का ज्ञान
याचिकाकर्ता का कहना था कि उक्त कंपनी को पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों के लेनदेन की इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग करने का ज्ञान नहीं था। इसके चलते कंपनी बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ियां कर रही है।
जिसे देने थे 14 हजार, कंपनी ने उसे दे दिए एक करोड़
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सरकार ने एक व्यक्ति को 14 हजार का भुगतान करना था, जिसे उक्त कंपनी ने एक करोड़ का भुगतान कर दिया। इसी तरह कई विभागों के कर्मचारियों के खाते में एक माह के बजाय तीन माह का वेतन डाल दिया गया।
पुलिस अधिकारियों को कारागार अधीक्षक बनाने पर जवाब तलब
वरिष्ठ कारागार अधीक्षकों और कारागार अधीक्षकों के सात पदों पर पुलिस विभाग के अधिकारियों को नियुक्त किए जाने पर हाईकोर्ट ने सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष काशीपुर के अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता का कहना था कि 12 फरवरी 2021 को जारी सरकार के आदेश के तहत राज्य के कारागारों में वरिष्ठ कारागार अधीक्षकों व कारागार अधीक्षकों के रिक्त पदों पर पुलिस विभाग के अधिकारियों की नियुक्तियां कर दीं गईं जो असांविधानिक हैं।
याचिका में कहा गया कि कारागार अधीक्षकों के पदों पर पुलिस विभाग के अधिकारियों की नियुक्ति से जेल में कैदियों के साथ दुर्व्यवहार होने की आशंका है। इससे न्यायिक हिरासत और पुलिस हिरासत के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि जेल अधीक्षकों के पदों पर पुलिस विभाग के अधिकारियों की नियुक्तियों को निरस्त किया जाए क्योंकि जेल एक सुधार गृह है और वहां पुलिस विभाग के अधिकारियों को नियुक्त करना न्यायविरुद्ध है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।