तीन साल में दो गुना बढ़ गए टीबी के मरीज, सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
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प्रदेश में टीबी रोगियों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। टीबी नियंत्रण के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च करने वाला विभाग बीमारी पर नियंत्रण लगाने में पूरी तरह फेल साबित हुआ है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि इसमें मल्टी ड्रग रसिस्टेंस (एमडीआर) रोगियों की संख्या ज्यादा है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी रोगियों की संख्या बढ़ने का कारण जांच की बेहतर व्यवस्था को बता रहे हैं।
प्रदेश में टीबी पर नियंत्रण और बीमारी के उपचार के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। उसके बावजूद बीमारी थमने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। विशेषकर मल्टी ड्रग रसिस्टेंस (एमडीआर) से पीड़ित रोगियों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोत्तरी हो रही है।
खुद स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर यकीन करें तो पिछले एक वर्ष के दौरान रोगियों की संख्या में डेढ़ सौ से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2015 में एमडीआर रोगियों की संख्या करीब दो सौ थी, जो इस वर्ष बढ़कर 364 हो गई है। वर्ष 2014 में यह संख्या महज 164 थी।
दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कार्टरेज बेस्ड न्यूक्लिक एसिड एंपलिफिकेशन टेस्ट (सीबीनेट) मशीनों से होने वाली बेहतर जांच से मरीजों की संख्या बढ़ने का दावा कर रहे हैं। उनके अनुसार पहले मरीजों की जांच नहीं हो पाती थी। ऐसे में मरीजों की संख्या कम होती थी। पिछले कुछ वर्षों के दौरान ज्यादातर जिलों में मशीन लग गई है, जिससे रोगियों की जांच अब जल्दी और बेहतर ढंग से होती है।
डॉट्स में भी खामियां
टीबी रोगियों को घर पर दवा उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ओर से डायरेक्टली ऑब्सर्व्ड ट्रीटमेंट शॉर्ट कोर्स (डॉट्स) प्रोग्राम चलाया जा रहा है। इसके तहत कार्यक्रम से जुड़े कर्मचारी टीबी रोगी को घर पर दवा उपलब्ध कराते हैं। लेकिन प्रदेश में बड़ी संख्या में कर्मियों के रोगियों को दवा न पहुंचाने की शिकायतें मिलती रही हैं। ऐसे में बीमारी कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है।
चार जिलों में नहीं सीबीनेट
प्रदेश के 13 में से चार जिलों में अभी तक सीबीनेट मशीन नहीं लग पाई है। इस मशीन की सहायता से टीबी आसानी से पकड़ में आ जाती है। केवल दो घंटे में टीबी के रोगी की पहचान की जा सकती है। अभी पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों में यह मशीन नहीं है। अधिकारियों के अनुसार, सेंट्रल टीबी डिवीजन की ओर से अगले कुछ माह में सभी जिलों में मशीन लगा दी जाएगी।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान टीबी की जांच की तकनीक में सुधार हुआ है। इससे रोगी की तुरंत पहचान कर उपचार करना संभव होता है। यही कारण है कि आंकड़ों में बढ़ोत्तरी हुई है। हालांकि यह रोगियों के लिए फायदेमंद है।
-डा. पंकज सिंह, सहायक निदेशक
नियमित रूप से छह माह तक टीवी की दवा न लेने वाले मरीजों को स्वस्थ होने के लिए 18 माह तक दवा खानी पड़ सकती है। एक कोर्स के रूप में छह माह तक लगातार दवा न खाने से टीबी ज्यादा घातक और जानलेवा हो जाती है। ऐसे में बिगड़ी हुई टीबी को ठीक करने के लिए 18 माह तक भी लगातार दवाई खानी पड़ सकती है।
-डा. रामेश्वर पांडे, चेस्ट फिजिशियन, दून अस्पताल