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उत्तराखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका, उमेश शर्मा मामले में मुकदमे के ट्रायल पर लगाई रोक

Fri, 14 Dec 2018 09:20 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 14 Dec 2018 09:20 PM IST
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Supreme court stop lawsuit trial on ias sting accused umesh sharma
आरोपी उमेश शर्मा - फोटो : अमर उजाला

आईएएस स्टिंग केस में आरोपी उमेश शर्मा को घेरने की कोशिश में जुटी पुलिस और सरकार को एक और झटका लगा है। 11 साल पहले रायपुर थाने में उमेश शर्मा के खिलाफ दर्ज मुकदमे के विचारण पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है।

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अदालत में उमेश के अधिवक्ताओं ने इसे उनके खिलाफ सरकार की साजिश करार दिया। पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने के बाद पहले इसमें खुद ही अंतिम रिपोर्ट लगाई थी। इसके बाद उच्च न्यायालय ने इसके विचारण पर स्टे दिया, लेकिन एकाएक सरकार ने इस स्टे को रद्द कराते हुए शर्मा का गिरफ्तारी वारंट हासिल कर लिया था।
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सूत्रों के अनुसार इसी मुकदमे में उमेश शर्मा पर शिकंजा कसने की तैयारी थी। बता दें कि उमेश के खिलाफ ब्लैकमेलिंग के आरोप में हाल ही में दर्ज हुए मुकदमे में भी पुलिस और सरकार को स्थानीय न्यायालय की तीखी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी थी।

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काबिलेगौर है कि एक चैनल के सीईओ उमेश शर्मा के खिलाफ उनके चैनल के एक पत्रकार की तहरीर पर 10 अगस्त को राजपुर थाने में ब्लैकमेलिंग व अन्य आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मुकदमे की कार्रवाई को बेहद गोपनीयता से अंजाम दिया गया।

करीब ढाई माह बाद 28 अक्तूबर को पुलिस एकाएक उमेश को गिरफ्तार करने गाजियाबाद स्थित उनके घर पहुंच गई। अब इस मुकदमे में साक्ष्यों का अभाव था या कुछ और पुलिस ने शर्मा पर शिकंजा कसने के लिए 11 साल पहले रायपुर थाने में दर्ज एक धोखाधड़ी के मुकदमे में देहरादून की अदालत से गिरफ्तारी वारंट हासिल किया।

पुलिस की यह कार्रवाई इतनी जल्दबाजी में की गई थी कि पता ही नहीं चला कि मुकदमे के विचारण पर हाईकोर्ट ने स्टे लगा रखा है। बाद में सरकार ने हस्तक्षेप कर हाईकोर्ट के स्टे को रद्द कराया और पुलिस ने इस मुकदमे में गिरफ्तारी वारंट हासिल कर लिया।
 

जब तक पुलिस इस मुकदमे में कोई कार्रवाई करती इससे पहले उमेश शर्मा को 28 नवंबर को सत्र न्यायालय देहरादून से जमानत मिल गई। इस बीच उमेश शर्मा को रांची में देशद्रोह के मुकदमे में पुलिस झारखंड ले गई, लेकिन वहां चंद दिनों में ही मुकदमा खारिज हो गया और उमेश को फिर जमानत हासिल हो गई।

इसके बाद उमेश शर्मा ने सभी आरोपों को चुनौती दी और सरकार व पुलिस को उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक खींच लिया। सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उमेश शर्मा की ओर से पैरवी की और 2007 में दर्ज मुकदमे की हकीकत न्यायालय को बताई। पता चला कि यह मुकदमा 2007 में दर्ज हुआ था, लेकिन उसी साल पुलिस इसमें साक्ष्यों के अभाव में अंतिम रिपोर्ट लगा चुकी थी।

इसके बाद साल 2009 में इसे दोबारा शुरू कराया गया, लेकिन उमेश शर्मा की अपील पर 2010 में उच्च न्यायालय ने इसमें विचारण स्टे दे दिया। साल 2010 से यह मुकदमा बंद पड़ा था, मगर अब एकाएक इसमें इस तरह की कार्रवाई को उमेश शर्मा के अधिवक्ताओं ने इसे षडयंत्र करार दिया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुकदमे के विचारण पर अंतरिम रोक लगा दी।

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