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Dehradun News: हिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ों की भार वहन क्षमता का आकलन कर हों निर्माण

Tue, 10 Sep 2024 01:54 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 10 Sep 2024 01:54 AM IST
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Pro. TN Singh said that cities in Himalayan regions
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Iहिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ों की भार वहन क्षमता का आकलन कर हों निर्माण
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Iवाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में हिमालय दिवस पर कार्यशाला का आयोजनI



आईआईटी पटना के निदेशक प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों के शहरों में पहाड़ों की भार वहन क्षमता का आकलन कर निर्माण होना चाहिए। साथ ही खतरनाक ढलानाें की स्थिरता की जांच के बाद निर्माण को अनुमति मिले। यह बात उन्हाेंने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में हिमालय दिवस पर आयोजित कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि कही। उन्होंने पहाड़ों में सुरंगों का निर्माण करते समय भूविज्ञानियों का परामर्श लेने की जरूरत बताई। इस दौरान विशेषज्ञों ने हिमालय में निर्माण के लिए स्थायित्व की जांच करते हुए मैदानी क्षेत्रों की पहचान करने की बात भी कही।


संस्थान के सभागार में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएं एवं हिमालय की पारिस्थितिकी पर आयोजित कार्यशाला में प्रो. टीएन सिंह ने हिमालय में सुरंगों के निर्माण में चुनौतियों एवं समाधान पर व्याख्यान देते हुए कहा कि सुरंगों के निर्माण से समय एवं ईंधन की बचत होती है लेकिन सुरंगों का निर्माण करते हुए भूविज्ञानों का परामर्श लेना अति आवश्यक है। संस्थान के पूर्व निदेशक एमजी ठक्कर ने हिमालयी क्षेत्र में भूकंप के खतरों के प्रति आगह करते हुए कहा कि भूकंपरोधी निर्माण सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में कमजोर ढलानों पर निर्माण से बचने की सलाह दी। साथ ही कहा कि हिमालय में निर्माण के लिए मैदानी क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और हिमाचल में 60 साल से बड़े भूकंप नहीं आए हैं। ऐसे में हमें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य में सात मैग्निट्यूट के भूकंप आने की आशंका से इकार नहीं किया जा सकता। इस मौके पर संस्थान निदेशक प्रो. एमजी ठक्कर ने प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है, जिसके संरक्षरण में विशेष ध्यान देने की जरूरत हैं। कार्यशाला में संस्थान के पूर्व निदेशक पदम वीसी ठाकुर ने बताया कि अब समय आ गया है कि भूस्खलन के नए मानचित्र बनाने के लिए लिडार तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। ताकि समूचे हिमालय क्षेत्र में पहाड़ों की सतही जानकारी हासिल हो सके। पूर्व निदेशक डॉ. बीआर अरोड़ा ने बताया कि हिमालय पर जितना प्राकृतिक तापमान बढ़ने से नुकसान हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा मानवीय दखल से हानि हो रही है। इसके अलावा पूर्व निदेशक डॉ. एनएस विरधी ने भी विचार रखे। कार्यशाला में अपर सचिव आनंद सिंह स्वरूप एवं डॉ शांतनु सरकार के अलावा डॉ. पेरूमल, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. आरके सहगल, प्रो. तलत अहमद, डॉ. अर्चना सरकार, डॉ. पंकज चौहान, डॉ. राजीव सिन्हा, डॉ डीपी कनूनगो एवं तनमय ममगाई आदि मौजूद रहे। कार्यशाला में डीआईटी विश्वविद्यालय एवं ग्राफिक एरा के छात्रों ने भाग लिया।
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