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जारी है उम्रकैद के बंदियों को पैरोल का सिलसिला
संजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 03 Oct 2016 12:51 PM IST
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कत्ल जैसी संगीन वारदात को अंजाम देकर उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों पर सरकारी मेहरबानियों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
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कभी पत्नी तो कभी मां के उपचार के नाम पर सजायाफ्ता कैदी जेल के बजाए अपने घर में सजा के दिन काट रहे हैं। यह स्थिति तब है जब गृह विभाग कई बार पैरोल देने से इंकार कर रहा है या फिर आला अधिकारी एक सीमा तक ही पैरोल देने की बात लिखित रूप से दे रह हैं।
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नियमानुसार कैदियों को विभिन्न कारणों से पैरोल देने की व्यवस्था है। वैसे तो ज्यादातर मामलों में खुद के या परिजनों के उपचार या फिर खेती समेत अन्य अत्यावश्य कार्यों को ही आधार बनाकर पैरोल लिया जाता है। पैरोल देने के पूर्व या फिर उसकी अवधि पूरी होने के बाद दोबारा अवधि बढ़ाने के लिए कारण की जांच की जाती है, मगर अमूमन यह काम गंभीरता से नहीं किया जाता है।
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नतीजा यह होता है कि आजीवन सजा पाने वाले कैदी भी महीनों तक जेल से पैरोल के नाम पर बाहर रहते हैं। पूर्व में पिथौरागढ़ के डांगटी गांव निवासी निरंजन सिंह पोखरिया, सितारगंज में उम्रकैद की सजा काट रहे मंजीत सिंह को भी धड़ल्ले से पैरोल देने के मामले सामने आए थे। ताजा प्रकरण देहरादून के नेहरू कॉलोनी निवासी नितिन सिंह और ऊधमसिंह नगर के परमजीत उर्फ पम्मा के हैं, जिनके पैरोल भी लगातार स्वीकृत हो रहे हैं।
केस-1 : नेहरू कॉलोनी के रहने वाले नितिन सिंह उर्फ विप्प को जून 2011 में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली। मां के इलाज के नाम पर आईजी जेल की संस्तुति पर 26 अगस्त से उसे केवल एक महीने का पैरोल देने की स्वीकृति दी गई। 25 सितंबर को यह अवधि बीतने के बाद पैरोल की अवधि तीन महीने बढ़ा दी गई।
केस-2 : ऊधमसिंह नगर के परमजीत उर्फ पम्मा को हत्या और हत्या के प्रयास की धाराओं में आजीवन कारावास हुआ है। उसे पत्नी के उपचार के नाम पर लगातार पैरोल दिया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब गृह विभाग ने खुद पैरोल की अवधि बढ़ाने के संबंध में नकारात्मक रिपोर्ट दी, मगर इस रिपोर्ट को ताक पर रखकर पैरोल बढ़ाने की स्वीकृति दे दी गई।