भैरव अखाड़े (जूना अखाड़ा) के संतों ने जंग के दौरान अपने युद्ध कौशल से राजस्थान के जूनागढ़ के निजाम को घुटने टेकने पर मजबूर दिया था। संन्यासियों के पराक्रम के आगे मुगल सेना के पैर उखड़ गए। इसके बाद निजाम ने सन्यासियों को संधि के लिए बुलाया और धोखे से भोजन में जहर दे दिया, लेकिन भोजन न करने वाले कुछ संन्यासी बच गए। इन्होंने ही बाद में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े का गठन किया। वर्ष 1145 में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में अखाड़े का पहला मठ स्थापित किया गया। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा शिव संन्यासी संप्रदाय के सभी सात अखाड़ों में सबसे बड़ा है। इसमें करीब पांच लाख नागा साधु है। अखाड़े के इष्टदेव रुद्रा अवतार गुरु दत्तात्रेय भगवान हैं। अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमंहत हरि गिरि ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि जूना अखाड़े का गौरवशाली इतिहास उसकी पहचान है। आठवीं शताब्दी में भैरव अखाड़े (जूना अखाड़ा) की शुरुआत हुई थी। जब देश मुगलों के आतंक से त्रस्त था तो अखाड़े के संन्यासियों ने लोगों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए। श्रीमहंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़े के सन्यासियों से युद्ध के दौरान जूनागढ़ के निजाम को मुंह की खानी पड़ी। तब निजाम ने संन्यासियों को जूनागढ़ सौंपने की बात कहते हुए भोजन पर आमंत्रित किया।
महाकुंभ 2021ः निजाम के धोखे के बाद हुआ जूना अखाड़े का उदय, संधि की आड़ में दिया था संन्यासियों को जहर
जितेंद्र जोशी, अमर उजाला, हरिद्वार
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Fri, 05 Mar 2021 01:02 PM IST
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