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शोध: नदियों में जाने वाला कूड़ा निगल रहीं मछलियां, ऋषिकेश और हरिद्वार की मछलियों के पेट से मिला प्लास्टिक

Fri, 25 Aug 2023 01:35 PM IST
रेनू सकलानी राजीव खत्री, अमर उजाला, ऋषिकेश
राजीव खत्री, अमर उजाला, ऋषिकेश Published by: रेनू सकलानी Updated Fri, 25 Aug 2023 01:35 PM IST
सार

देवप्रयाग से हरिद्वार तक किए शोध में मछलियों के पेट में प्लास्टिक पाया गया है। जिसमें कपड़ों के रेशे, थर्माकोल आदि प्लास्टिक शामिल है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कूड़ा निस्तारण की उचित व्यवस्था न होना, कूड़े को गंगा व उसकी सहायक नदियों में प्रवाहित करना और पर्यटन के नाम पर नदियों के किनारे अनियंत्रित गतिविधियां इसका कारण हैं।

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Fishes swallowing garbage going into rivers plastic found in stomach Rishikesh haridwar Uttarakhand news
शोध के दौरान मछलियों के पेट से मिला प्लास्टिक - फोटो : amar ujala

विस्तार

कूड़ा प्रबंधन की उचित व्यवस्था न होना और नदियों में अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियां मछलियों की सेहत पर भारी पड़ रही हैं। गढ़वाल विवि के एक शोध के अनुसार मछलियों के शरीर में प्लास्टिक पाया गया है। सबसे बुरी स्थिति ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा में पाई जाने वाली मछलियों की है।

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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विवि के हिमालयी जलीय जैव विविधता विभाग (हिमालयन एक्वेटिक बायोडावरसिटी डिपार्टमेंट) ने देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा नदी की मछलियों पर अध्ययन किया है। शोध के लिए हिमालयी जलीय जैव विविधता विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ. जसपाल सिंह चौहान और शोध छात्रा नेहा बडोला ने इस पूरे क्षेत्र को दो जोन (देवप्रयाग से ऋषिकेश और ऋषिकेश से हरिद्वार) में बांटा। देवप्रयाग से ऋषिकेश को पहाड़ी क्षेत्र और ऋषिकेश से हरिद्वार को मैदानी क्षेत्र माना गया।

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शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। देवप्रयाग से हरिद्वार तक किए शोध में मछलियों के पेट में प्लास्टिक पाया गया है। जिसमें कपड़ों के रेशे, थर्माकोल आदि प्लास्टिक शामिल है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कूड़ा निस्तारण की उचित व्यवस्था न होना, कूड़े को गंगा व उसकी सहायक नदियों में प्रवाहित करना और पर्यटन के नाम पर नदियों के किनारे अनियंत्रित गतिविधियां इसका कारण हैं। शोध में दोनों जोन का तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हुआ है कि हरिद्वार व ऋषिकेश की मछलियों में यह समस्या अधिक पाई गई है।

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चार प्रजातियों के लिए नमूने

शोध के लिए गंगा नदी में मिलने वाली मछलियों की चार प्रमुख प्रजातियों गारा, लेबियो, टोर और स्कीजोथोरेक्स के पेट के नमूने लिए गए। इनके पेट में पॉलीमर, माइक्रो प्लास्टिक, कपड़ों के रेशे के अवशेष मिले। पूर्व में गढ़वाल विवि के हिमालयी जलीय विविधता विभाग ने अलकनंदा नदी में जलीय प्रदूषण पर शोध किया था। जिसमें यह स्पष्ट हुआ था कि मछलियां प्रदूषित जल और सामग्री को भोजन के रूप में निगल रही हैं।

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शोध में मछलियों के पेट में हानिकारक माइक्रो प्लास्टिक, कपड़ों के रेशे, थर्माकोल आदि के अवशेष मिले हैं। ऋषिकेश और हरिद्वार की मछलियों में यह समस्या अधिक है। दूसरे चरण के शोध में यह पता लगाया जाएगा कि इस प्लास्टिक से मछलियों को कितना नुकसान हो रहा है। इन मछलियों को खाने से मानव को कितना नुकसान होगा। - डाॅ. जसपाल सिंह चौहान, विभागाध्यक्ष, हिमालयी जलीय जैव विविधता विभाग, गढ़वाल विवि

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