नारी निकेतन कांड: संवासिनी को इंसाफ दिलाने वाला ‘असली हीरो’ गुमनाम
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नारी निकेतन में मूक बधिर संवासिनी पर ज्यादती के राज को गोपनीय पत्र के माध्यम से ‘अमर उजाला’ से साझा करने वाला ‘असली हीरो’ आज भी गुमनाम है। दुष्कर्म और गर्भपात के आरोपियों को दोषी करार दिए जाने का पूरा श्रेय इसी शख्स को जाता है। उस समय यह हीरो अपराध के खिलाफ आवाज न उठाता तो शायद ही संवासिनी को इंसाफ मिल पाता।
यह ‘गोपनीय पत्र’ ही नारी निकेतन के दरिंदों के चेहरे बेनकाब करने का हथियार बनेगा, उस समय किसी से नहीं सोचा भी नहीं था। मुख्यमंत्री और सचिव समाज कल्याण को संबोधित इस पत्र का फैक्स कई मीडिया हाउस को भेजा गया था। लेकिन, तब सिर्फ अमर उजाला ने पत्र की संवेदनशीलता को समझा और संवासिनी को इंसाफ दिलाने की मुहिम शुरू की।
साक्ष्य के तौर पर केवल फैक्स ही था
हालांकि उस समय साक्ष्य के तौर पर केवल फैक्स ही था। कहना मुश्किल था कि पत्र में लिखे गए शब्द सच हैं या झूठ। इसीलिए अमर उजाला टीम ने फैक्स की सच्चाई जानने का फैसला किया। सच को उजागर करने में अमर उजाला को काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। आलोचना भी हुई और समर्थन भी मिला। तत्कालीन कांग्रेस सरकार एक बार तो जांच तक कराने को तैयार नहीं थी। अफसरों के इनपुट के बाद तत्कालीन एसएसपी सदानंद दाते और एसपी सिटी अजय सिंह की अगुवाई में एसआईटी गठित हुई।
एसआईटी ने ईमानदारी से जांच की तो सच सामने आता चला गया। एक-एक कर साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़कर एसआईटी केंद्र अधीक्षिका समेत तमाम आरोपियाें को जेल के सीखचों के पीछे पहुंचा दिया गया। अदालत में मूक बधिर संवासिनी के भ्रूण और दुष्कर्मी का डीएनए मिलान बड़ा साक्ष्य बना। शुक्रवार को अदालत ने संवासिनी से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के नौ आरोपियों को दोषी करार दिया। यह संभव हो पाया गुमनाम पत्र भेजने वाले शख्स की वजह से।
अमर उजाला को मिला था केसीके कुलिश अवार्ड
नारी निकेतन में हुए इस मामले में खोजी रिपोर्टिंग के लिए अमर उजाला को केसीके कुलिश अवार्ड मिला था। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अमर उजाला टीम को यह अवार्ड देकर सम्मानित किया था।
अमर उजाला की मुहिम के चलते नारी निकेतन का सच सामने आ सका। साक्ष्यों को मिटाने की भरसक कोशिश हुई, लेकिन एसआईटी के टीम वर्क ने पूरी साजिश को तार-तार कर दिया। शुरूआत में एसआईटी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पीड़ित संवासिनी का पता लगाने की थी, क्योंकि मूक बधिर होने के कारण पीड़ित अपना दर्द साझा नहीं कर सकती है। पीड़ित संवासिनी को एक बार तो एसआईटी के सामने नहीं लाया गया। नारी निकेतन के सूत्रों से जानकारी मिलने के बाद सख्ती बरती गई तो संवासिनी की पहचान हुई। मेडिकल आधार पर गर्भपात की पुष्टि हुई। परिस्थितिजनक साक्ष्यों के साथ वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए गए। इसका सुखद नतीजा आज सबके सामने है।
- सदानंद दाते, तत्कालीन एसआईटी प्रभारी