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Uttarakhand: आपदाओं का खतरा बढ़ने के साथ ही जलवायु परिवर्तन से पशुपालन पर संकट, खतरे में परंपरागत नस्लें भी

Tue, 02 Sep 2025 12:15 PM IST
रेनू सकलानी आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 02 Sep 2025 12:15 PM IST
सार

-गढ़वाल विवि के शोधार्थियों का शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन से पशुपालन पर भी संकट है। परंपरागत नस्लें भी खतरे में हैं।

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Climate change poses a threat to animal husbandry Research published Uttarakhand News in hindi
जलवायु परिवर्तन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जलवायु परिवर्तन से उत्तराखंड पर न केवल आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है बल्कि पशुपालन भी संकट में आ रहा है। गढ़वाल विवि के शोधार्थियों के शोध में यह चुनौती सामने आई है। यह शोध अगस्त माह में अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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गढ़वाल विवि के शोधार्थियों सोनाली राजपूत, शुभम थापा और आभा रावत ने जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी परिक्षेत्र में हो रहे बदलावों पर शोध किया है। तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा और बर्फबारी की कमी से पारंपरिक पशुचारण व्यवस्था प्रभावित हो रही है। इससे न केवल पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है बल्कि स्थानीय किसानों की आजीविका भी संकट में पड़ गई है।

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पर्वतीय जिलों में पशुपालन मुख्य रूप से छोटे किसान और जनजातीय समुदाय करते हैं। बदलते मौसम की मार ने इनकी रोजी-रोटी पर असर डालना शुरू कर दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले जहां मई-जून तक बर्फ जमी रहती थी, अब मार्च में ही बर्फ पिघल जाती है। इससे गर्मियों में ऊंचाई वाले बुग्याल (चारागाह) समय से पहले सूखने लगे हैं। इससे चराई का समय छोटा हो गया है और चारे की कमी से पशु कमजोर हो रहे हैं।

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जानवरों में बढ़ा हीट स्ट्रेस

बढ़ते तापमान के कारण गाय-बकरियों में हीट स्ट्रेस की समस्या बढ़ी है। इससे दूध उत्पादन घटा है और पशु बीमारियों के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। स्थानीय पशुपालकों का कहना है कि पहले जो पशु सालभर स्वस्थ रहते थे, अब उन्हें बार-बार बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। परंपरागत जल स्रोत जैसे झरने और धाराएं या तो सूख रही हैं या अनियमित बहाव के चलते भरोसेमंद नहीं रह गई हैं। 92% ग्रामीणों ने बताया कि झरने और नदियां अब स्थायी नहीं रह गई हैं। इससे न केवल पशुओं को पानी मिलना मुश्किल हो गया है बल्कि चारे की खेती भी प्रभावित हो रही है। ओक के पेड़, जो चारे और पत्तों का बड़ा स्रोत थे, अब घटते जा रहे हैं। जंगल में आग, सड़क निर्माण और अत्यधिक चराई ने हालात बिगाड़े हैं।

देसी नस्लें हो रहीं लुप्त

गढ़वाली बकरी और पहाड़ी गाय जैसी स्थानीय नस्लें, जो कठिन पहाड़ी जलवायु के अनुकूल रही हैं, अब जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर हो रही हैं। कई किसान अब मुनाफे के लिए बाहरी नस्लों से क्रॉसब्रीडिंग कर रहे हैं, जिससे पारंपरिक नस्लों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। भारी बारिश, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं पशुओं को सीधे नुकसान पहुंचा रही हैं। कई चारागाह बह गए हैं। रास्ते बंद होने से बाजार तक पहुंचना मुश्किल होता है।

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महिलाओं पर बढ़ रहा बोझ

पानी और चारा लाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की होती है। अब इन्हें पहले से दोगुना समय देना पड़ रहा है। कई परिवारों ने पशुओं की संख्या कम कर दी है और छोटे पशुओं जैसे बकरी और मुर्गी पालन की ओर रुख कर लिया है। खाद्य की कमी के चलते भालू, तेंदुए और सूअर जैसे जंगली जानवर अब गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। शोध में 68 प्रतिशत ग्रामीणों ने बताया कि उनके पशु इन जानवरों का शिकार बन चुके हैं। इससे पशुपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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