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अशोक चक्रधर ने जमकर हंसाया, रुलाया और जादू चलाया

Sun, 19 Feb 2017 11:42 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 19 Feb 2017 11:42 AM IST
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ashok chakradhar in dehradun literature fest
ashok chakradhar - फोटो : amar ujala

देहरादून लिटरेचर फेस्ट में देश के जाने माने हास्य कवि और हास्य रस के शिखर पुरुष डॉ. अशोक चक्रधर का जादू जमकर चला। कार्यक्रम में चक्रधर ने ऐसा समां बांधा कि जैसे समय रुक सा गया। उनकी एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों पर लोग जमकर खिलखिलाए और भावुक भी हुए।

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ओएनजीसी ऑफिसर्स क्लब परिसर में चल रहे देहरादून लिटरेचर फेस्ट में शनिवार को हास्य कवि डॉ. अशोक चक्रधर के सत्र ‘चक्रधर के चमन में’ के माडरेटर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक दिनेश मानसेरा थे। इस सत्र में मानसेरा ने चक्रधर के साथ लोकतंत्र, हास्य कविता, हिंसा, क्रोध, हिंदी की शक्ति व अंग्रेजी के महत्व, भाषा की मौलिकता, शब्दों की शक्ति व ग्रहण क्षमता और स्थानीय भाषा-बोली के महत्व पर चर्चा की। साथ ही हिंदी और रोजगार के सह संबंध पर भी विमर्श किया। चापलूसी की ताकत पर उनकी पंक्ति पूंछ वालों की पूछ है, मूंछ वाले तो बेचारे... ने लोगों को खूब हंसाया। 
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दर्शकों के सवाल पर अशोक चक्रधर ने कहा कि हास्य में व्याकरण का बंधन नहीं होता है। हास्य मुख्य तौर पर अचानक होने वाली प्रतिक्रिया है। इसमें रत्ती मात्र भी बनावट नहीं होती। लिहाजा हास्य को दूसरे व्यक्ति द्वारा आसानी से पढ़कर सुनाया नहीं जा सकता। हास्य सहज चेतना है, हालांकि हास्य में मर्यादा बेहद जरूरी है। हास्य के नाम पर फूहड़ता पर अशोक चक्रधर जमकर बरसे।
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उन्होंने कहा कि टीवी पर टीआरपी के चक्कर में हास्य के नाम पर बेहूदगी, छिछोरापन व टुच्चापन परोसा जा रहा है। इनका नारा है कविता गिराओ, टीआरपी बढ़ाओ। लेकिन हकीकत ठीक इससे उलट है। लोग सुंदर हास्य सुनना चाहते हैं। सुरुचि पूर्ण हास्य को कुरुचि के जहर ने भ्रष्ट कर दिया है। इसके लिए नई पीढ़ी को आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि एक बार उन्होंने अभिनेत्री को लवस्कार बोला तो शबाना ने उन्हें लवस्ते कहा। इस दौरान बड़ी तादाद में गणमान्य नागरिक और वेल्हम गर्ल्स स्कूल की छात्राएं उपस्थित थीं।

बैंक बैलेंस सिफर हुआ तो कोरे सिद्धांतवाद से की तौबा
अभिनेता, लेखक, फिल्म निदेशक, गीतकार पीयूष मिश्रा शनिवार को दून लिटरेचर फेस्ट में पहुंचे। उन्होंने अपने गीत और कविताएं सुनाकर वातावरण को गंभीर कर दिया। उसके बाद उन्होंने यौन जीवन, प्रेम, पैसे, कैरियर, सिविल एक्टिविज्म, सैक्स परवर्जन, फैमिनिस्जम पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि 1983 से लेकर 2003 बीस साल थियेटर को दिए। इस दौरान भयानक मुफलिसी झेली। थियेटर को दिए। मैं वामपंथी था। जिसके पास हृदय होगा वह लेफ्टिस्ट तो होगा ही न। लेकिन उसके बाद उसी पर अटक के रह जाना अतार्किक है। थियेटर ने बहुत कुछ दिया लेकिन पैसा नहीं।

2003 तक हालत यह हो गई बैंक बैलेंस सिफर। कहा अगर दोस्तों की मदद न होती तो न जाने क्या होता। पत्नी कमाई कर रही थी। औकात देसी की नहीं थी लेकिन पीता हजारों की कीमत वाली व्हीस्की था। धर्मशाला में टिकने की हैसियत नहीं पर ठहरता पंच सितारा होटलों में था। लेकिन ऐसा कब तक चलता।


दो बेटे हैं उनके भविष्य को लेकर मन में डर-खौफ बैठ गया। बस फैसला लिया कि सिनेमा में रोजी रोटी तलाशूंगा। मेरे सामने विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं था बस सिर्फ और सिर्फ अस्तित्व बचाने का प्रश्न था। पैसा कमाना था। इसे अवसरवादी कहना, स्वार्थी होना कहना मुनासिब न होगा। यह व्यवहारिकता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने बल्लीमारान नामक बैंड बनाया है अब साथ लेकर चलूंगा। इस मौके पर रणधीर अरोड़ा, प्रवीण कुमार, अनुराग चौहान आदि उपस्थित थे।

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