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शिक्षक दिवस: मुरलीधर जगूड़ी...जिनकी आंखों से ओझल दुनिया, शिष्यों को सुरों की तालीम देकर देख ली पूरी कायनात

Sat, 05 Sep 2026 05:09 PM IST
Renu Saklani अलका त्यागी
अलका त्यागी Published by: Renu Saklani Updated Sat, 05 Sep 2026 05:09 PM IST
सार

रोशनी की कमी उनकी राह में कभी दीवार नहीं बनी, सुरों ने ही उन्हें नई दिशा दी।
मुरलीधर जगूड़ी ने संगीत को साधना बनाया और अपनी कला से कई शिष्यों का जीवन संवार दिया।

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Blind Music Teacher Murlidhar Jagudi Continues Classical Music Journey at 80 Inspires Students Teacher Day
मुरलीधर जगूड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सीमाएं शरीर की हो सकती हैं, सपनों और प्रतिभा की नहीं...ये साबित किया शास्त्रीय संगीत शिक्षक मुरलीधर जगूड़ी ने। आंखों में रोशनी नहीं थी, लेकिन सुरों की दुनिया उनके लिए कभी अंधेरी नहीं हुई। संगीत को जीवन का आधार बनाकर उन्होंने न केवल अपनी राह रोशन की, बल्कि वर्षों तक विद्यार्थियों के जीवन में भी सुर और संवेदना के रंग भरे।

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नेत्रहीन होने की चुनौती को पीछे छोड़ उन्होंने केंद्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक के रूप में अपनी पूरी जिंदगी संगीत और शिक्षा को समर्पित कर दी। शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका जीवन सुरों की साधना और नई पीढ़ी को संगीत से जोड़ने की मिसाल बना हुआ है।

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जगूड़ी को बचपन से ही संगीत पसंद था लेकिन बेहद ही कम उम्र में बीमारी के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई। उस वक्त थोड़ी हताशा हुई, लेकिन हिम्मत बांधी और संगीत सीखा। इतना ही नहीं बनारस हिंदू विवि में पढ़ाई के दौरान वह गोल्ड मेडलिस्ट रहे। इसके बाद केंद्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक की नौकरी की। यूपी के रामपुर में नौकरी के बाद देहरादून में केवी हाथीबड़कला में नियुक्ति हुई। यहां कई छात्रों को संगीत सिखाया और वर्ष 2006 में रिटायर हुए।

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सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रखी साधना

सेवानिवृत्ति के बाद भी जगूड़ी ने संगीत को नहीं छोड़ा। उन्होंने घर पर ही संगीत सिखाना शुरू किया। उनके पास शिष्य वहीं संगीत सीखने आते हैं। 80 वर्ष की उम्र में आज भी वह अपने शिष्यों को संगीत सिखा रहे हैं।

20 रुपये फीस में भी सिखाया

जगूड़ी के बेटे सुलभ ने बताया कि उन्होंने संगीत को व्यवसाय नहीं साधना बनाया। जब लोग पैसों के पीछे भागते थे, उन्होंने अपने शिष्यों से 20 रुपये तक भी फीस ली है। अगर शिष्य फीस देना चाहते भी हैं तो आज भी वह 400 या 500 रुपये ही फीस लेते हैं। जिनके अंदर सीखने का जुनून है उन्हें वह निशुल्क भी संगीत सिखाते हैं।

आवाज से पहचान लेते हैं अपने शिष्यों को

मुरलीधर जगूड़ी के शिष्य रहे गौतम थापा ने बताया उन्होंने 1993 से 2006 तक उनसे संगीत की शिक्षा ली। नौकरी के लिए विदेश तक गए, लेकिन गुरु का ज्ञान और संगीत का प्रेम उन्हें वापस खींच लाया। अब उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया है। बताया कि गुरुजी स्कूल के समय में अपने शिष्यों को उनकी आवाज से और छूकर पहचान लेते थे और आज भी वह ऐसे ही अपने शिष्यों को पहचानते हैं।

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संगीत की शिक्षा दुनिया को देकर जाएंगे यही गुरु दक्षिणा

गायिका अंशु थपलियाल ने बताया कि उन्होंने कक्षा छह से संगीत की शिक्षा ली। गुरुजी ने शिक्षकों के आए पैसों के हिस्से को कभी नहीं लिया। दिखाई ना देने के बाद भी संगीत पर इतनी गहरी पकड़ ही असली साधना है। उनसे सीखकर आज हम नाम कमा रहे हैं। यही शिक्षा समाज को देखकर जाएंगे उनके लिए यही हमारी गुरु दक्षिणा होगी।

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