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यहां नहीं होती पशु बलि, देवता को जीवित बकरें किए जाते हैं अर्पित

Sat, 20 Aug 2022 01:03 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 20 Aug 2022 01:03 AM IST
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Animal sacrifice is not done in Mahasu temple, live goats are offered
हनोल स्थित महासू मंदिर में पशु बलि नहीं दी जाती है। 18 साल पहले महाशिव पुराण अनुष्ठान के बाद यहां पशु बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया। देवता को जीवित बकरे अर्पित किए जाते हैं।
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हनोल स्थित महासू मंदिर परिसर में बकरे दिखाई देते हैं। पूर्व तक यहां पशु बलि की प्रथा थी, लेकिन वर्ष 2004 में हुए महाशिव पुराण अनुष्ठान के बाद पशु बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालांकि इसे प्रभावी बनाने में करीब छह साल लग गए। महाराज के पुरोहित मोहन लाल सेमवाल ने बताया कि मान्यता है कि हर 100 साल बाद एक अनुष्ठान हुआ करता था, जिसे खुरास्ह कहा जाता था। इसमें 25 बकरों की बलि दी जाती थी। समाज में जागरूकता आने पर इस प्रथा को बंद कर दिया गया। वर्ष 2010 में शासन की सख्ती के बाद पशु बलि पूरी तरह से बंद हो गई।
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उन्होंने बताया कि मंदिर में अब पशु बलि की जगह प्रसाद के रूप में आटा और गुड़ चढ़ाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में कढाह चढ़ाना कहते हैं। कई श्रद्धालु आज भी मंदिर में बकरा छोड़ जाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में घाण्डुआ कहते हैं। घाण्डुआ को अभिमंत्रित जल से पूजा जाता है। यह प्रक्रिया स्थानीय भाषा में धूण कहलाती है। इस धूण के बाद यह माना जाता है कि देवता ने बकरा स्वीकार कर लिया और उसे जीवित छोड़ दिया जाता है। इन घाण्डुआ को ना कोई मार सकता है, ना ही इसे कोई बंदी बना सकता है। ये आज भी मंदिर परिसर में घूमते नजर आते हैं।
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