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नहाय खाय के साथ छह महापर्व आज से , तैयारियां पूरी

Sun, 11 Nov 2018 02:08 AM IST
Updated Sun, 11 Nov 2018 02:08 AM IST
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नहाय खाय के साथ छह महापर्व आज से , तैयारियां पूरी
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो।
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देहरादून। सूर्य की उपासना का महापर्व डाला छठ (सूर्यषष्ठी) व्रत नहाय-खाय के साथ आज रविवार से शुरू हो गया। चार दिवसीय (11 नवंबर से 14 नवंबर सुबह तक) महाव्रत की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। पहले दिन शुद्धता और पवित्रता के साथ व्रत का संकल्प लिया जाएगा। दूसरे दिन पंचमी खरना पर कुलदेवता की पूजा होगी। कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मंगलवार को गंगा समेत विभिन्न नदियोें में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। सूर्यदेव की कठिन पूजा के लिए शनिवार देर शाम तक महिलाएं और पुरुष घर में साफ-सफाई कार्य में व्यस्त रहे। पूजा सामग्री खरीदने के लिए दिनभर बाजारों में भारी भीड़ रही।
सूर्यषष्ठी पर शुद्धता का विशेष महत्व होता है। भगवान सूर्य की पूजा का प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ी से लेकर बर्तन तक सभी को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। पूजा सामग्री बनाने के लिए फूल और पीतल के बर्तन उपयोग में लाए जाते हैं। व्रत रखने से पहले घर-आंगन और व्रती का पवित्र होना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए पहले दिन नहाय-खाय के दौरान गंगा स्नान कर व्रती महिलाएं और पुरुष स्वयं को पवित्र करते हैं। गंगाजल से पूरे घर को पवित्र किया जाता है। व्रत का पकवान गंगाजल से ही बनता है। दिनभर व्रत करने के बाद शाम को लौकी की सब्जी, रोटी या चावल खाया जाता है। दूसरे दिन पंचमी को व्रती एक समय बिना नमक का भोजन करते हैं। जबकि षष्ठी को निर्जला व्रत रखकर गंगा, यमुना जैसी नदियों या फिर सरोवर में कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सप्तमी की सुबह को उगते सूरज को अर्घ्य देकर व्रत का पारण होता है।
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सूर्य षष्ठी व्रत की मुख्य शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना से मानी जाती है। वेदाचार्यों के मुताबिक व्रत रखने वाले पूरे दिन निर्जला रहकर घर में पूजा स्थल या कमरे में पूड़ी, रोटी और मीठा चावल बनाते हैं। बंद कमरे में गोधूलि बेला में पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद और जल ग्रहण किया जाता है। प्रसाद खाते समय किसी प्रकार का शोर न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। यदि खाना खाते समय तेज आवाज कान में पड़ जाए तो अशुभ माना जाता है। डाला छठ पर्व में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। इस महापर्व में सबसे खास बात यह है कि उगते सूर्य के पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि सूर्य उपासना से बड़ी से बड़ी विपदा को टाला जा सकता है।
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