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...पहाड़ के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर
Updated Fri, 27 Jul 2018 02:18 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
पहाड़ के आपदा प्रभावित गांवों की उपेक्षा पर सोशल मीडिया पर प्रदेश सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश दिख रहा है। सरकार की ओर से मलिन बस्तियों को बचाने के लिए अध्यादेश लाने के बाद यह गुस्सा और बढ़ गया है। लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि मलिन बस्तियों को बचाने के लिए अध्यादेश लाने में सरकार ने चार दिन नहीं लगाए। तब जमीन की कमी देखी गई न खराब आर्थिक व्यवस्था का रोना रोया गया। प्रदेशभर के लोगों ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ जबरदस्त प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
फेसबुक वॉल से-
‘आपने वोट बैंक को खिसकने न दिया। अबके म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनावी जलसे में हुजूर साहब बहादुर के कारिंदों को इन्हीं बस्तियों की वोट मिलेंगी। मेरी मानो तो इस विधेयक का नाम मलिन बस्ती वोट बैंक विधेयक 2018 रख दिया जाए।’ अखिलेश डिमरी,
‘झूलते तार और ट्रॉलियों में कट गए कई साल, लेकिन तुमने नहीं देखी हमारी पीड़ा, न पूछा हाल, असली आपदा तो सचिवालय में आई थी, जहां चार करोड़ एक पुल की बनवाई थी।’ पंकज मैंदोली
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‘भाई जब अवैध को वैध बनाने का पहाड़ा साहब बहादुर को आता है तो चमोली-रुद्रप्रयाग में टेंट कॉलोनी से अपनी रोजी-रोटी चला रहे यहां के मूल निवासियों के बारे में तो कुछ सोचते।’ कृष्णा सेमवाल
‘ग्याड़ू गढ़वाली देहरादून में भी जमीन खरीदने की सोचता है जबकि भाजपा-कांग्रेस फ्री में उपलब्ध करा रही है। ’ मुजीब नैथानी
‘हम दो आंसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
अतिक्रमण का जाल बिछा है देहरादून की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
पहाड़ के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर...’ रोहित भट्ट
व्हाट्स एप से-
‘गढ़-कुमौं के कई गांव आपदा के कारण विस्थापन की राह देख रहे हैं। सरकार के पास इन्हें देने के लिए जमीन नहीं है। मलिन बस्ती वालों के लिए तो अध्यादेश है...भुगतो और मरो’ कमल रावत
‘नकली राजधानी को पहले ही नरक बना दिया तुमने। अब हाईकोर्ट ने मौका दिया तो अध्यादेश ले आए। काश ऐसी तेजी राजधानी, पलायन, रोजगार के मुद्दों पर भी दिखाई होती।’ वेदप्रकाश
‘80 लाख गढ़वाली-कुमाऊंनी कौन है। सरकार को तो केवल चार-पांच लाख वोटरों की चिंता है। तुम्हारी चिंता होती तो कुछ करते। जिनकी चिंता थी, उनके लिए अध्यादेश ले तो आए हैं। भाजपा-कांग्रेस सब एक जैसे हैं।’ संजय खंडूरी
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पहाड़ के आपदा प्रभावित गांवों की उपेक्षा पर सोशल मीडिया पर प्रदेश सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश दिख रहा है। सरकार की ओर से मलिन बस्तियों को बचाने के लिए अध्यादेश लाने के बाद यह गुस्सा और बढ़ गया है। लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि मलिन बस्तियों को बचाने के लिए अध्यादेश लाने में सरकार ने चार दिन नहीं लगाए। तब जमीन की कमी देखी गई न खराब आर्थिक व्यवस्था का रोना रोया गया। प्रदेशभर के लोगों ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ जबरदस्त प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
फेसबुक वॉल से-
‘आपने वोट बैंक को खिसकने न दिया। अबके म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनावी जलसे में हुजूर साहब बहादुर के कारिंदों को इन्हीं बस्तियों की वोट मिलेंगी। मेरी मानो तो इस विधेयक का नाम मलिन बस्ती वोट बैंक विधेयक 2018 रख दिया जाए।’ अखिलेश डिमरी,
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‘झूलते तार और ट्रॉलियों में कट गए कई साल, लेकिन तुमने नहीं देखी हमारी पीड़ा, न पूछा हाल, असली आपदा तो सचिवालय में आई थी, जहां चार करोड़ एक पुल की बनवाई थी।’ पंकज मैंदोली
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‘भाई जब अवैध को वैध बनाने का पहाड़ा साहब बहादुर को आता है तो चमोली-रुद्रप्रयाग में टेंट कॉलोनी से अपनी रोजी-रोटी चला रहे यहां के मूल निवासियों के बारे में तो कुछ सोचते।’ कृष्णा सेमवाल
‘ग्याड़ू गढ़वाली देहरादून में भी जमीन खरीदने की सोचता है जबकि भाजपा-कांग्रेस फ्री में उपलब्ध करा रही है। ’ मुजीब नैथानी
‘हम दो आंसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
अतिक्रमण का जाल बिछा है देहरादून की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
पहाड़ के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर...’ रोहित भट्ट
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‘गढ़-कुमौं के कई गांव आपदा के कारण विस्थापन की राह देख रहे हैं। सरकार के पास इन्हें देने के लिए जमीन नहीं है। मलिन बस्ती वालों के लिए तो अध्यादेश है...भुगतो और मरो’ कमल रावत
‘नकली राजधानी को पहले ही नरक बना दिया तुमने। अब हाईकोर्ट ने मौका दिया तो अध्यादेश ले आए। काश ऐसी तेजी राजधानी, पलायन, रोजगार के मुद्दों पर भी दिखाई होती।’ वेदप्रकाश
‘80 लाख गढ़वाली-कुमाऊंनी कौन है। सरकार को तो केवल चार-पांच लाख वोटरों की चिंता है। तुम्हारी चिंता होती तो कुछ करते। जिनकी चिंता थी, उनके लिए अध्यादेश ले तो आए हैं। भाजपा-कांग्रेस सब एक जैसे हैं।’ संजय खंडूरी