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'सचिन पर बेवजह हव्वा, द्रविड़ बेहतर खिलाड़ी'
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 15 Nov 2013 01:36 PM IST
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पूरा देश क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर की विदाई के रोमांच में खोया है, लेकिन देश के पूर्व सुपर कॉप और लेखक केएन दारूवाला इसे बेवजह हव्वा मानते हैं। वह तो लक्ष्मण, द्रविण और पुजारा के फैन है।
सेक्टर-17 परेड ग्राउंड में चल रहे चंडीगढ़ बुक फेयर-2013 में शिरकत करने पहुंचे दारूवाला ने किताबों के रोमांच से लेकर आम जिंदगी से जुड़ी यादों को साझा किया।
उन्होंने कहा कि आज के युवा लेखक स्मार्ट हैं, वह पहले से बेहतर राइटिंग स्किल का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन, दारूवाला ने माना कि मार्केट में पब्लिशर्स सिर्फ मोटी कमाई करने वाले लेखकों पर ही दांव लगाते हैं।
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उन्होंने कहा कि चेतन भगत और शोभा डे इसका ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि बेशक अब ई-बुक का जमाना है, लेकिन असल किताबों का स्थान कोई नहीं ले सकता।
गवर्नमेंट कालेज लुधियाना से ग्रेजुएट और पीजी करने वाले दारूवाला कहते हैं कि बेहतर लेखक तैयार करने के लिए स्कूल कालेज स्तर पर अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति जरूरी है।
रिफ्यूजी फिल्म की कहानी उनके कहानी से कापी करने के सवाल पर वह बोले कि कई लोगों ने भी ऐसा कहा है, लेकिन फिल्म मेकर ने अगर ऐसा दावा किया होता तो वह उन पर केस जरूर करता।
उन्होंने बताया अगले 20 दिनों के अंदर एक अन्य किताब बाजार में आएगी। राइटिंग फिल्ड में आने के सवाल पर उन्होंने कहा कि 12 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने कविताएं लिखना शरू किया था।
उन्होंने बताया कि जब भी वह लखनऊ जाते हैं तो ढेर सारी किताबें खरीदते थे। उन्होंने युवाओं से कहा कि बेहतर लेखक बनने के लिए अच्छा रीडर होना जरूरी है। साथ ही अपने आसपास की चीजों को महसूस कर उसे कलम से कागज पर उतारना सीखें।
सुपर कॉप से अब तक का सफर
1958 में आईपीएस में चुने जाने वाले केएन दारूवाला का जिंदगी को लेकर अलग ही नजरिया है। वह कहते हैं कि लिखने की कला सिखाई नहीं, बल्कि जन्मजात होती है।
उन्होंने बताया कि एमए परीक्षा के चार दिन बाद ही आईएएस की परीक्षा दी और मेरिट में 7वां रैंक हासिल कर लिया। दारूवाला ने माना कि वह कभी भी पुलिस ऑफसर नहीं बनना चाहते थे, लेकिन उस समय उनके पास कोई विकल्प नहीं था।
11 किताबों के अलावा, 3 लघु कहानी और एक नॉवेल वह लिख चुके हैं। 1976 में लैंड स्कैप के लिए कॉमनवेल्थ अवार्ड के अलावा 82 में साहित्य अकादमी से भी सम्मान पा चुके हैं। क्रिकेट के शौकीन दारूवाला ने कहा कि स्कूल, कालेज के दिनों में वह टीम के कैप्टन रह चुके हैं।
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सेक्टर-17 परेड ग्राउंड में चल रहे चंडीगढ़ बुक फेयर-2013 में शिरकत करने पहुंचे दारूवाला ने किताबों के रोमांच से लेकर आम जिंदगी से जुड़ी यादों को साझा किया।
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उन्होंने कहा कि आज के युवा लेखक स्मार्ट हैं, वह पहले से बेहतर राइटिंग स्किल का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन, दारूवाला ने माना कि मार्केट में पब्लिशर्स सिर्फ मोटी कमाई करने वाले लेखकों पर ही दांव लगाते हैं।
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उन्होंने कहा कि चेतन भगत और शोभा डे इसका ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि बेशक अब ई-बुक का जमाना है, लेकिन असल किताबों का स्थान कोई नहीं ले सकता।
गवर्नमेंट कालेज लुधियाना से ग्रेजुएट और पीजी करने वाले दारूवाला कहते हैं कि बेहतर लेखक तैयार करने के लिए स्कूल कालेज स्तर पर अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति जरूरी है।
रिफ्यूजी फिल्म की कहानी उनके कहानी से कापी करने के सवाल पर वह बोले कि कई लोगों ने भी ऐसा कहा है, लेकिन फिल्म मेकर ने अगर ऐसा दावा किया होता तो वह उन पर केस जरूर करता।
उन्होंने बताया अगले 20 दिनों के अंदर एक अन्य किताब बाजार में आएगी। राइटिंग फिल्ड में आने के सवाल पर उन्होंने कहा कि 12 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने कविताएं लिखना शरू किया था।
उन्होंने बताया कि जब भी वह लखनऊ जाते हैं तो ढेर सारी किताबें खरीदते थे। उन्होंने युवाओं से कहा कि बेहतर लेखक बनने के लिए अच्छा रीडर होना जरूरी है। साथ ही अपने आसपास की चीजों को महसूस कर उसे कलम से कागज पर उतारना सीखें।
सुपर कॉप से अब तक का सफर
1958 में आईपीएस में चुने जाने वाले केएन दारूवाला का जिंदगी को लेकर अलग ही नजरिया है। वह कहते हैं कि लिखने की कला सिखाई नहीं, बल्कि जन्मजात होती है।
उन्होंने बताया कि एमए परीक्षा के चार दिन बाद ही आईएएस की परीक्षा दी और मेरिट में 7वां रैंक हासिल कर लिया। दारूवाला ने माना कि वह कभी भी पुलिस ऑफसर नहीं बनना चाहते थे, लेकिन उस समय उनके पास कोई विकल्प नहीं था।
11 किताबों के अलावा, 3 लघु कहानी और एक नॉवेल वह लिख चुके हैं। 1976 में लैंड स्कैप के लिए कॉमनवेल्थ अवार्ड के अलावा 82 में साहित्य अकादमी से भी सम्मान पा चुके हैं। क्रिकेट के शौकीन दारूवाला ने कहा कि स्कूल, कालेज के दिनों में वह टीम के कैप्टन रह चुके हैं।