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Chandigarh News: महिला आरक्षण बिल पास न होने से महिलाएं निराश
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चंडीगढ़। महिला आरक्षण बिल को लेकर देशभर में उम्मीदें और निराशा दोनों देखने को मिल रही हैं। जहां एक ओर इसे महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा था, वहीं इसके पास न हो पाने से सवाल उठ रहे हैं कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार कब मिलेगा।
समर्थन न मिलना निराशाजनक
महिला आरक्षण बिल को लेकर देशभर की महिलाओं में काफी उम्मीद थी, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके अधिकार और भागीदारी से जुड़ा हुआ था। लोगों को भरोसा था कि इस बार सभी दल मिलकर इसे पास करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। खासकर विपक्ष का पूरा समर्थन न मिलना महिलाओं के लिए निराशाजनक रहा। यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं था, बल्कि महिलाओं को बराबरी का मौका देना था। -भारती वर्मा, महिला
प्रगति को धीमा कर देते हैं ऐसे फैसले
यह बिल पास होना चाहिए था क्योंकि इससे महिलाओं को निर्णय लेने वाली जगहों पर ज्यादा अवसर मिलते। लेकिन जिस तरह से इसे विपक्ष का सहयोग नहीं मिला, उससे साफ है कि अभी भी महिलाओं के मुद्दों को राजनीति से ऊपर नहीं रखा जा रहा। इससे महिलाओं को बड़ा झटका लगा है और उनकी उम्मीदें भी टूटती नजर आई हैं। आज भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, ऐसे फैसले उनकी प्रगति को धीमा कर देते हैं। -मेनका गुप्ता, महिला
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राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़ना होगा
नारी शक्ति वंदन अधिनियम सिर्फ एक बिल ही नहीं अपितु महिलाओं की भावनाएं हैं। इस विषय पर देश में चार दशक तक बहुत राजनीति कर ली गई है। आजादी के दशकों बाद भी भारत की महिलाओं का निर्णय प्रक्रिया में इतना कम प्रतिनिधित्व रहे, ये ठीक नहीं। अब जरूरत है कि इस विषय को फिर से प्राथमिकता दी जाए और सभी राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर महिलाओं के हित में फैसला लिया जाए।-गीतांजलि वाधवा एडवोकेट, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
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समर्थन न मिलना निराशाजनक
महिला आरक्षण बिल को लेकर देशभर की महिलाओं में काफी उम्मीद थी, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके अधिकार और भागीदारी से जुड़ा हुआ था। लोगों को भरोसा था कि इस बार सभी दल मिलकर इसे पास करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। खासकर विपक्ष का पूरा समर्थन न मिलना महिलाओं के लिए निराशाजनक रहा। यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं था, बल्कि महिलाओं को बराबरी का मौका देना था। -भारती वर्मा, महिला
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प्रगति को धीमा कर देते हैं ऐसे फैसले
यह बिल पास होना चाहिए था क्योंकि इससे महिलाओं को निर्णय लेने वाली जगहों पर ज्यादा अवसर मिलते। लेकिन जिस तरह से इसे विपक्ष का सहयोग नहीं मिला, उससे साफ है कि अभी भी महिलाओं के मुद्दों को राजनीति से ऊपर नहीं रखा जा रहा। इससे महिलाओं को बड़ा झटका लगा है और उनकी उम्मीदें भी टूटती नजर आई हैं। आज भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, ऐसे फैसले उनकी प्रगति को धीमा कर देते हैं। -मेनका गुप्ता, महिला
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राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़ना होगा
नारी शक्ति वंदन अधिनियम सिर्फ एक बिल ही नहीं अपितु महिलाओं की भावनाएं हैं। इस विषय पर देश में चार दशक तक बहुत राजनीति कर ली गई है। आजादी के दशकों बाद भी भारत की महिलाओं का निर्णय प्रक्रिया में इतना कम प्रतिनिधित्व रहे, ये ठीक नहीं। अब जरूरत है कि इस विषय को फिर से प्राथमिकता दी जाए और सभी राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर महिलाओं के हित में फैसला लिया जाए।-गीतांजलि वाधवा एडवोकेट, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट