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यूटी इंप्लाइज हाउसिंग स्कीम पर फैसला लें वरना अंजाम को तैयार रहें: हाईकोर्ट
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 24 Feb 2017 09:17 AM IST
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : File Photo
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन के 4000 सरकारी कर्मचारियों के लिए बनाई गई हाउसिंग स्कीम के तहत भूमि देने में हुई 8 साल की देरी पर प्रशासन को आड़े हाथों लिया। हाईकोर्ट ने प्रशासन को फटकार लगाते एडवाइजर को आदेश दिए कि इस मामले की अगली सुनवाई तक स्कीम पर फैसला करें वरना दोषी अधिकारी परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाएं। आवश्यकता पड़ी तो दोषियों के खिलाफ मामला दर्ज करने के आदेश भी जारी किए जाएंगे।
वीरवार को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन, केंद्र सरकार और हाउसिंग बोर्ड से कर्मचारियों के लिए बनाई गई हाउसिंग स्कीम पर जवाब मांगा। इस पर फिर से जिम्मेदारी एक -दूसरे पर टालते नजर आने पर हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासक के सलाहकार केंद्र सरकार को साथ लेकर इस मामले का हल निकालें। कोर्ट ने कहा कि पहले ही इस मामले में बहुत देरी हो चुकी है।
यह स्कीम 2008 की है और अब 2017 है। इतने लंबे समय से खून पसीने की कमाई अपने पास रखी और अब टालमटोल वाला रवैया दिखाया जा रहा है। जब इन कर्मियों से इस हाउसिंग स्कीम के लिए पैसे लिए गए थे तो क्यों यह पैसा केंद्र सरकार को जमा करवाया गया। कोर्ट ने कहा कि जिस प्रकार का रवैया अपनाया जा रहा है उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं और क्यों न इस मामले की जांच करवाई जाए। मामले में प्रशासक के सलाहकार को कार्रवाई कर 4 मई तक हाईकोर्ट में जवाब दाखिल करना होगा।
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वीरवार को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन, केंद्र सरकार और हाउसिंग बोर्ड से कर्मचारियों के लिए बनाई गई हाउसिंग स्कीम पर जवाब मांगा। इस पर फिर से जिम्मेदारी एक -दूसरे पर टालते नजर आने पर हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासक के सलाहकार केंद्र सरकार को साथ लेकर इस मामले का हल निकालें। कोर्ट ने कहा कि पहले ही इस मामले में बहुत देरी हो चुकी है।
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यह स्कीम 2008 की है और अब 2017 है। इतने लंबे समय से खून पसीने की कमाई अपने पास रखी और अब टालमटोल वाला रवैया दिखाया जा रहा है। जब इन कर्मियों से इस हाउसिंग स्कीम के लिए पैसे लिए गए थे तो क्यों यह पैसा केंद्र सरकार को जमा करवाया गया। कोर्ट ने कहा कि जिस प्रकार का रवैया अपनाया जा रहा है उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं और क्यों न इस मामले की जांच करवाई जाए। मामले में प्रशासक के सलाहकार को कार्रवाई कर 4 मई तक हाईकोर्ट में जवाब दाखिल करना होगा।
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यहां फंसा है मामला
Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh
- फोटो : File Photo
यहां फंसा है मामला
चंडीगढ़ प्रशासन के कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के मामले में प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी थी। दरअसल, हाउसिंग बोर्ड के सामने सबसे बड़ी समस्या जमीन की बढ़ी हुई कीमत है। प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने इस स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी हुई कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी।
एक -दूसरे को ठहराया जाता है जिम्मेदार
हाईकोर्ट में इस मामले पर पिछली कई सुनवाई के दौरान प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी करने का आरोप लगा रहा था, वहीं हाउसिंग बोर्ड चंडीगढ़ प्रशासन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। प्रशासन ने कहा था कि हाउसिंग बोर्ड ने जमीन लेने के लिए प्रशासन के पास पैसे जमा नहीं करवाए, इसलिए प्रशासन ने जमीन जारी नहीं की। वहीं हाउसिंग बोर्ड ने कहा कि जब बोर्ड ने स्कीम जारी की थी, उस समय जमीन का रेट 7920 रुपये गज थे। आज के समय चंडीगढ़ में जमीन का दाम 60 हजार रुपये गज है। बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी कहा था कि वह इस स्कीम को रद कर रहा है।
बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैंक को ध्यान में रखकर करोड़ो रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है, लेकिन अपने उन कर्मचारी जिन्होंने अपनी सारी उम्र प्रशासन की सेवा की है, उनके लिए मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि इस मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकता है।
चंडीगढ़ प्रशासन के कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के मामले में प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी थी। दरअसल, हाउसिंग बोर्ड के सामने सबसे बड़ी समस्या जमीन की बढ़ी हुई कीमत है। प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने इस स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी हुई कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी।
एक -दूसरे को ठहराया जाता है जिम्मेदार
हाईकोर्ट में इस मामले पर पिछली कई सुनवाई के दौरान प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी करने का आरोप लगा रहा था, वहीं हाउसिंग बोर्ड चंडीगढ़ प्रशासन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। प्रशासन ने कहा था कि हाउसिंग बोर्ड ने जमीन लेने के लिए प्रशासन के पास पैसे जमा नहीं करवाए, इसलिए प्रशासन ने जमीन जारी नहीं की। वहीं हाउसिंग बोर्ड ने कहा कि जब बोर्ड ने स्कीम जारी की थी, उस समय जमीन का रेट 7920 रुपये गज थे। आज के समय चंडीगढ़ में जमीन का दाम 60 हजार रुपये गज है। बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी कहा था कि वह इस स्कीम को रद कर रहा है।
बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैंक को ध्यान में रखकर करोड़ो रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है, लेकिन अपने उन कर्मचारी जिन्होंने अपनी सारी उम्र प्रशासन की सेवा की है, उनके लिए मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि इस मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकता है।