{"_id":"10dc19bac22050ac8a1afc356db0c657","slug":"tribute-to-khushwant-singh","type":"story","status":"publish","title_hn":"'साहित्य में खुशवंत का रेडिएशन फैलता रहेगा'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
'साहित्य में खुशवंत का रेडिएशन फैलता रहेगा'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 21 Mar 2014 04:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लीक से हटकर लेखन और पत्रकारिता, समकालीन विषयों पर हल्के फुल्के व्यंग्य से प्रहार, विवादों से घिरे लेख। वह कलम जब चली तो ऐसी कि कुछ न कुछ नया सामने आया।
विज्ञापन
यही था खुशवंत सिंह का नजरिया। उन्होंने परंपराओं को पीछे छोड़ा और अपनी शैली रची।
चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की चेयरपर्सन मंजू जैदका ने कहा कि उन्होंने अंग्रेजी साहित्य को नया मंच दिया। उनका लेखन जुदा था इसलिए क्योंकि वह अलग सोचते थे, लोगों के बीच भी रहते थे।
विज्ञापन
जिंदादिल इंसान खुशवंत सिंह ने बंटवारे जैसे बेहद गंभीर विषय पर एक पुस्तक ट्रेन टू पाकिस्तान लिखकर लोगों को अपनी कलम की जादूगरी से अभिभूत कर दिया था।
थिएटर डायरेक्टर नीलम मान सिंह चौधरी का उनके साथ अनुभव जरा हटकर रहा। वह बताती हैं कि जब वह जाब के लिए मुंबई गई तो कोई नहीं जानता था। उनके पिता को खुशवंत सिंह जानते थे। मैने परिचय दिया। वहां जॉब मिल गई। मैं ट्रेनी थी पर वह हमेशा सबके साथ मुझको रखते थे। उनकी लेखन की शैली जुदा रही। वह अलग सोचते थे, परंपरा से हटकर।
विज्ञापन
सेंट जोंस स्कूल की पूर्व अध्यापिका मनप्रीत भुल्लर ने कहा कि करीब आठ साल पहले खुशवंत सिंह से मिलने का मौका मिला। वह कसौली में गर्मियों में आते थे, मैं अपने परिवार के साथ वहां थीं। अक्सर उनके किस्से सुनती थी तो थोड़ा डर सा लगता एक दिन ठाना कि अब मिलकर आना है।
खैर, चली गई, उन्होंने हंसकर दरवाजा खोला। मुझसे पूछा कि कौन हैं, क्या है, उसके बाद उनका स्वभाव पता चला, वह तो एक जिंदादिल इंसान थे, जिनके आसपास कोई नहीं। पहाड़ी सन्नाटा उनको काफी अच्छा लगता है और उसको वह एंज्वाय करते हैं। वास्तव में लेखन में तो उनके निधन के बाद भी उनकी किताबों से रेडिएशन फैलता रहेगा।