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व्यक्ति का मालिकाना हक हो तो भी संरक्षित वन भूमि पर नहीं हो सकती पेड़ों की कटाई : हाईकोर्ट
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यदि इसकी अनुमति दी गई तो पर्यावरण पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा
अंबाला निवासी याची को सफेदे के पेड़ काटने की अनुमति देने से हाईकोर्ट का इन्कार
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि संरक्षित वन भूमि पर यदि कोई वृक्ष है तो उसे काटा नहीं जा सकता, भले ही भूमि का स्वामित्व उस व्यक्ति के पास हो, जो उसे कटवाना चाहता है।
2008 में अंबाला निवासी गज्जन सिंह व अन्य ने संरक्षित वन घोषित भूमि के मालिक होने का दावा करते हुए वन विभाग को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें भूमि पर उगाए गए सफेदे के पेड़ों की कटाई से रोका न जाए। न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी और अपीलीय अदालत ने भी इसे बरकरार रखा। इसके बाद याची ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने कहा, याची की भूमि पर लगाए गए वृक्षों की कटाई भारतीय वन अधिनियम के तहत अनुमति योग्य नहीं है। जहां सफेदे के पेड़ लगे हैं, उसे संरक्षित वन घोषित किया गया था। भारतीय वन अधिनियम की धारा 35 के तहत संरक्षित भूमि पर पेड़ों की कटाई पर कानूनी रोक है। यह प्रावधान पर्यावरण पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है और यह पारिस्थितिकी असंतुलन को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। सभी तर्कों और तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की खंडपीठ ने कहा, यदि यह मान भी लिया जाए कि वादी विवादित भूमि के मालिक हैं, तो भी उन्हें वहां पेड़ों की कटाई की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे पर्यावरण पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 35 लागू की गई है।
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अंबाला निवासी याची को सफेदे के पेड़ काटने की अनुमति देने से हाईकोर्ट का इन्कार
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि संरक्षित वन भूमि पर यदि कोई वृक्ष है तो उसे काटा नहीं जा सकता, भले ही भूमि का स्वामित्व उस व्यक्ति के पास हो, जो उसे कटवाना चाहता है।
2008 में अंबाला निवासी गज्जन सिंह व अन्य ने संरक्षित वन घोषित भूमि के मालिक होने का दावा करते हुए वन विभाग को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें भूमि पर उगाए गए सफेदे के पेड़ों की कटाई से रोका न जाए। न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी और अपीलीय अदालत ने भी इसे बरकरार रखा। इसके बाद याची ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने कहा, याची की भूमि पर लगाए गए वृक्षों की कटाई भारतीय वन अधिनियम के तहत अनुमति योग्य नहीं है। जहां सफेदे के पेड़ लगे हैं, उसे संरक्षित वन घोषित किया गया था। भारतीय वन अधिनियम की धारा 35 के तहत संरक्षित भूमि पर पेड़ों की कटाई पर कानूनी रोक है। यह प्रावधान पर्यावरण पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है और यह पारिस्थितिकी असंतुलन को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। सभी तर्कों और तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
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जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की खंडपीठ ने कहा, यदि यह मान भी लिया जाए कि वादी विवादित भूमि के मालिक हैं, तो भी उन्हें वहां पेड़ों की कटाई की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे पर्यावरण पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 35 लागू की गई है।
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