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जिन चरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं, उन चरागों को हवाओं से बचाया जाए : हाईकोर्ट
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चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड चंडीगढ़ के आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने इस दौरान प्रसिद्ध कवि निदा फाजली की कविता उद्धृत करते हुए कहा कि ‘जिन चरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं, उन चरागों को हवाओं से बचाया जाए।’ जस्टिस कुलदीप तिवारी ने अपने फैसले में कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 का उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें सुधारने और समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करना है।
इस मामले में अपराध करने वाले नाबालिग पर धारा 377 आईपीसी और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने धारा 15 के तहत जांच कर यह निष्कर्ष निकाला कि 16 वर्ष से अधिक उम्र का यह नाबालिग मानसिक और शारीरिक रूप से इतना सक्षम है कि उसे वयस्क के रूप में मुकदमे का सामना करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा प्रारंभिक आकलन का निर्णय बच्चे के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालता है। अगर नाबालिग को वयस्क के रूप में मुकदमे का सामना करना पड़ता है तो उसे वयस्क के रूप में मुकदमे में उम्रकैद तक की सजा हो सकती है, जबकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत सुनवाई में अधिकतम तीन साल की सजा होती है।
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जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत सुनवाई होने पर अपराध से जुड़ी अयोग्यता नाबालिग पर लागू नहीं होगी, लेकिन वयस्क के रूप में सुनवाई होने पर यह छूट नहीं मिलेगी। कोर्ट ने पाया कि सामाजिक जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट था कि नाबालिग को अपने कार्य के परिणामों की जानकारी नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि नाबालिग पारिवारिक उपेक्षा का शिकार था और उसका व्यक्तित्व अंतर्मुखी था। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने इन पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया।
हाईकोर्ट ने मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को पुन: सौंपते हुए कहा कि प्रारंभिक आकलन करते समय कानूनी सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाए। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रारंभिक आकलन के लिए विशेषज्ञों जैसे मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली जानी चाहिए।
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इस मामले में अपराध करने वाले नाबालिग पर धारा 377 आईपीसी और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने धारा 15 के तहत जांच कर यह निष्कर्ष निकाला कि 16 वर्ष से अधिक उम्र का यह नाबालिग मानसिक और शारीरिक रूप से इतना सक्षम है कि उसे वयस्क के रूप में मुकदमे का सामना करना चाहिए।
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हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा प्रारंभिक आकलन का निर्णय बच्चे के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालता है। अगर नाबालिग को वयस्क के रूप में मुकदमे का सामना करना पड़ता है तो उसे वयस्क के रूप में मुकदमे में उम्रकैद तक की सजा हो सकती है, जबकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत सुनवाई में अधिकतम तीन साल की सजा होती है।
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जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत सुनवाई होने पर अपराध से जुड़ी अयोग्यता नाबालिग पर लागू नहीं होगी, लेकिन वयस्क के रूप में सुनवाई होने पर यह छूट नहीं मिलेगी। कोर्ट ने पाया कि सामाजिक जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट था कि नाबालिग को अपने कार्य के परिणामों की जानकारी नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि नाबालिग पारिवारिक उपेक्षा का शिकार था और उसका व्यक्तित्व अंतर्मुखी था। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने इन पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया।
हाईकोर्ट ने मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को पुन: सौंपते हुए कहा कि प्रारंभिक आकलन करते समय कानूनी सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाए। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रारंभिक आकलन के लिए विशेषज्ञों जैसे मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली जानी चाहिए।

24jjrp15- बेरी। कार्यक्रम को संबोधित करते इंद्रेश कुमार। स्त्रोत- आयोजक- फोटो : udhampur