{"_id":"697cb7b855860e005c092d10","slug":"the-doaba-region-has-become-the-real-battleground-of-punjab-politics-chandigarh-news-c-46-1-spkl1013-109579-2026-01-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: पंजाब की राजनीति का असली रणक्षेत्र बना दोआबा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: पंजाब की राजनीति का असली रणक्षेत्र बना दोआबा
विज्ञापन
-पीएम मोदी का जालंधर दौरा, चन्नी की मजबूत पकड़ और आप की रणनीति
-- -
सुरिंदर पाल
जालंधर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रविदास जयंती के अवसर पर जालंधर दौरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह पंजाब की सत्ता राजनीति में चल रही सबसे निर्णायक लड़ाई का भी संकेत है। दोआबा क्षेत्र अब सिर्फ जिला नहीं, बल्कि दलित राजनीति की धुरी और राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन चुका है। यहां एक-एक कदम, एक-एक बयान और प्रतीक आने वाले चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों की निगाहें विशेष रूप से जालंधर और इसके दलित मतदाताओं पर टिक गई हैं। यह लड़ाई केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि दलित नेतृत्व, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक वर्चस्व की भी है।
कांग्रेस सांसद और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी आज दलित राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं। दोआबा क्षेत्र में उनकी पकड़ बेहद मजबूत है, जहां दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एक दलित मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान, जालंधर से सांसद होने का अनुभव और सामाजिक न्याय की राजनीति उन्हें कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत बनाती है। कांग्रेस की रणनीति दलित स्वाभिमान, रविदासिया पहचान और सामाजिक अधिकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित है जिसमें चन्नी सबसे सशक्त आवाज़ हैं।
भाजपा की नई राजनीतिक लकीर
प्रधानमंत्री मोदी का डेरा सचखंड बल्लां में माथा टेकना, संत निरंजन दास से आशीर्वाद लेना और पंजाब के लिए संभावित घोषणाएं सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं। आदमपुर एयरपोर्ट का नाम गुरु रविदास महाराज पर रखने की मांग, नेशनल हॉलिडे की चर्चा और रविदास जी पर रिसर्च सेंटर जैसी पहलें भाजपा की इस दिशा को स्पष्ट करती हैं कि वह पंजाब के दलित समाज को नेतृत्व के स्तर पर जोड़ना चाहती है।
विज्ञापन
आम आदमी पार्टी की सक्रिय रणनीति
मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार भी दलित समाज के साथ अपने जुड़ाव को मजबूत करने में लगी है। योजना, कल्याण कार्यक्रम, सामाजिक सम्मान और छात्रों को वज़ीफ़ा वितरण जैसी पहलें यह संदेश देती हैं कि दलित हितों की असली राजनीतिक प्रतिनिधि वही है। प्रो. कुणाल के अनुसार डेरों का झुकाव इस पूरे समीकरण में निर्णायक साबित होता है। जब डेरा किसी पार्टी के पक्ष में होता है, तो दलित वोट उसी दिशा में बढ़ता है।
दलित वोट का निर्णायक केंद्र
पंजाब में दलित वोट बैंक 35-37 प्रतिशत है और यह 117 विधानसभा सीटों में कई स्थानों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। विशेषकर दोआबा क्षेत्र, जहां कई सीटों पर दलित मतदाता 40 प्रतिशत से अधिक हैं, इस युद्ध का सबसे अहम मोर्चा है। रविदासिया, माझबी सिख, रामदासिया और बाल्मीकि समुदाय हर दल की रणनीति का हिस्सा हैं। डेरा सचखंड बल्लां जैसी धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं इस राजनीतिक झुकाव में किंगमेकर की भूमिका निभा रही हैं। ये केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सामूहिक पहचान और चुनावी प्रभाव के स्तंभ बन चुके हैं।
दलित वोट का इतिहास और बदलाव
1980-1990 में दलित समाज का झुकाव कांग्रेस की ओर था। सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याण योजनाओं के कारण कांग्रेस ग्रामीण दलितों में मजबूत रही।1990 के बाद शिरोमणि अकाली दल ने माझबी सिख और ग्रामीण दलितों में पैठ बनाई, वहीं भाजपा को शहरी दलित वर्ग का समर्थन मिला। 2007-2017 में दलित वोट स्थिर नहीं रहा। 2017 में कांग्रेस की वापसी हुई, अकाली सरकार के खिलाफ नाराजगी और पुराने सामाजिक आधार ने दलित मतदाताओं को आकर्षित किया। 2021-22 में चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से दलित राजनीति में नया मोड़ आया। रविदासिया और रामदासिया समुदाय का झुकाव कांग्रेस की ओर मजबूत हुआ। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और बदलाव की राजनीति के जरिए दलित वोट का रुख बदल दिया। यह पिछले दशकों में सबसे बड़ा शिफ्ट माना गया।
दलित वोट का महत्व
-पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में दलित वोट का हिस्सा लगभग 35-37%
-दोआबा क्षेत्र में कई सीटों पर 40% से अधिक
-रविदासिया, माझबी सिख, रामदासिया, बाल्मीकि समुदाय निर्णायक
-डेरा सचखंड बल्लां और अन्य धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव बड़ा
विज्ञापन
सुरिंदर पाल
जालंधर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रविदास जयंती के अवसर पर जालंधर दौरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह पंजाब की सत्ता राजनीति में चल रही सबसे निर्णायक लड़ाई का भी संकेत है। दोआबा क्षेत्र अब सिर्फ जिला नहीं, बल्कि दलित राजनीति की धुरी और राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन चुका है। यहां एक-एक कदम, एक-एक बयान और प्रतीक आने वाले चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों की निगाहें विशेष रूप से जालंधर और इसके दलित मतदाताओं पर टिक गई हैं। यह लड़ाई केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि दलित नेतृत्व, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक वर्चस्व की भी है।
कांग्रेस सांसद और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी आज दलित राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं। दोआबा क्षेत्र में उनकी पकड़ बेहद मजबूत है, जहां दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एक दलित मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान, जालंधर से सांसद होने का अनुभव और सामाजिक न्याय की राजनीति उन्हें कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत बनाती है। कांग्रेस की रणनीति दलित स्वाभिमान, रविदासिया पहचान और सामाजिक अधिकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित है जिसमें चन्नी सबसे सशक्त आवाज़ हैं।
विज्ञापन
भाजपा की नई राजनीतिक लकीर
प्रधानमंत्री मोदी का डेरा सचखंड बल्लां में माथा टेकना, संत निरंजन दास से आशीर्वाद लेना और पंजाब के लिए संभावित घोषणाएं सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं। आदमपुर एयरपोर्ट का नाम गुरु रविदास महाराज पर रखने की मांग, नेशनल हॉलिडे की चर्चा और रविदास जी पर रिसर्च सेंटर जैसी पहलें भाजपा की इस दिशा को स्पष्ट करती हैं कि वह पंजाब के दलित समाज को नेतृत्व के स्तर पर जोड़ना चाहती है।
विज्ञापन
आम आदमी पार्टी की सक्रिय रणनीति
मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार भी दलित समाज के साथ अपने जुड़ाव को मजबूत करने में लगी है। योजना, कल्याण कार्यक्रम, सामाजिक सम्मान और छात्रों को वज़ीफ़ा वितरण जैसी पहलें यह संदेश देती हैं कि दलित हितों की असली राजनीतिक प्रतिनिधि वही है। प्रो. कुणाल के अनुसार डेरों का झुकाव इस पूरे समीकरण में निर्णायक साबित होता है। जब डेरा किसी पार्टी के पक्ष में होता है, तो दलित वोट उसी दिशा में बढ़ता है।
दलित वोट का निर्णायक केंद्र
पंजाब में दलित वोट बैंक 35-37 प्रतिशत है और यह 117 विधानसभा सीटों में कई स्थानों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। विशेषकर दोआबा क्षेत्र, जहां कई सीटों पर दलित मतदाता 40 प्रतिशत से अधिक हैं, इस युद्ध का सबसे अहम मोर्चा है। रविदासिया, माझबी सिख, रामदासिया और बाल्मीकि समुदाय हर दल की रणनीति का हिस्सा हैं। डेरा सचखंड बल्लां जैसी धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं इस राजनीतिक झुकाव में किंगमेकर की भूमिका निभा रही हैं। ये केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सामूहिक पहचान और चुनावी प्रभाव के स्तंभ बन चुके हैं।
दलित वोट का इतिहास और बदलाव
1980-1990 में दलित समाज का झुकाव कांग्रेस की ओर था। सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याण योजनाओं के कारण कांग्रेस ग्रामीण दलितों में मजबूत रही।1990 के बाद शिरोमणि अकाली दल ने माझबी सिख और ग्रामीण दलितों में पैठ बनाई, वहीं भाजपा को शहरी दलित वर्ग का समर्थन मिला। 2007-2017 में दलित वोट स्थिर नहीं रहा। 2017 में कांग्रेस की वापसी हुई, अकाली सरकार के खिलाफ नाराजगी और पुराने सामाजिक आधार ने दलित मतदाताओं को आकर्षित किया। 2021-22 में चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से दलित राजनीति में नया मोड़ आया। रविदासिया और रामदासिया समुदाय का झुकाव कांग्रेस की ओर मजबूत हुआ। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और बदलाव की राजनीति के जरिए दलित वोट का रुख बदल दिया। यह पिछले दशकों में सबसे बड़ा शिफ्ट माना गया।
दलित वोट का महत्व
-पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में दलित वोट का हिस्सा लगभग 35-37%
-दोआबा क्षेत्र में कई सीटों पर 40% से अधिक
-रविदासिया, माझबी सिख, रामदासिया, बाल्मीकि समुदाय निर्णायक
-डेरा सचखंड बल्लां और अन्य धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव बड़ा