{"_id":"696e4a92622144a64f003a03","slug":"the-dangerous-presence-of-uranium-in-punjabs-groundwater-has-raised-concerns-according-to-research-by-ct-university-chandigarh-news-c-74-1-lud1001-113929-2026-01-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: पंजाब के भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मौजूदगी, सीटी विश्वविद्यालय के शोध ने बढ़ाई चिंता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: पंजाब के भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मौजूदगी, सीटी विश्वविद्यालय के शोध ने बढ़ाई चिंता
विज्ञापन
-दक्षिण-पश्चिमी जिलों में सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक यूरेनियम, उथला भूजल सबसे ज्यादा प्रभावित
-- -
राजीव शर्मा
लुधियाना। पंजाब के दक्षिण-पश्चिमी जिलों के भूजल में यूरेनियम की अत्यधिक और खतरनाक मात्रा पाए जाने का खुलासा हुआ है। सीटी विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ के सहायक अधिष्ठाता डॉ. सतवीर सिंह के नेतृत्व में किए गए इस महत्वपूर्ण शोध ने राज्य के लिए गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य खतरे की घंटी बजा दी है। यह अध्ययन आरयूएसए 2.0 अनुदान के तहत गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर और टोक्यो मेट्रोपॉलिटन विश्वविद्यालय, जापान के सहयोग से किया गया।
इन जिलों में सबसे अधिक खतरा
शोध के अनुसार बठिंडा, मानसा, मोगा और बरनाला जिलों के भूजल में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा तय 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक पाई गई। बठिंडा और मानसा में 60 प्रतिशत से अधिक नमूने इस मानक से ऊपर दर्ज किए गए। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 200 फीट से कम गहराई वाले जल स्रोत सबसे अधिक प्रदूषित हैं, जिससे ग्रामीण आबादी पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
शोध में किए गए स्वास्थ्य जोखिम आकलन के अनुसार, यूरेनियम युक्त जल का लंबे समय तक सेवन करने से किडनी संबंधी रोगों, हड्डियों की कमजोरी और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या भविष्य में और विकराल रूप ले सकती है।
विज्ञापन
प्रदूषण के प्रमुख कारण
अध्ययन में यूरेनियम प्रदूषण के लिए प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग, भूजल का अंधाधुंध दोहन और औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्ट प्रवाह को जिम्मेदार माना गया है।
सतत जल प्रबंधन प्रमुख समाधान
शोध में यूरेनियम हटाने के लिए उन्नत नैनो-आधारित तकनीकों को आशाजनक बताया गया है लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए स्वच्छ सतही जल की उपलब्धता बढ़ाना और सतत जल प्रबंधन अपनाना आवश्यक है। सीटी विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर डॉ. मनबीर सिंह ने कहा कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं को जल संसाधनों की सुरक्षा और आम जनता के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। वहीं, डॉ. सतवीर सिंह ने स्पष्ट किया कि दक्षिण-पश्चिमी पंजाब का उथला भूजल फिलहाल पीने योग्य नहीं है और भविष्य की भूजल नीतियों के निर्धारण में यह शोध महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विज्ञापन
राजीव शर्मा
लुधियाना। पंजाब के दक्षिण-पश्चिमी जिलों के भूजल में यूरेनियम की अत्यधिक और खतरनाक मात्रा पाए जाने का खुलासा हुआ है। सीटी विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ के सहायक अधिष्ठाता डॉ. सतवीर सिंह के नेतृत्व में किए गए इस महत्वपूर्ण शोध ने राज्य के लिए गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य खतरे की घंटी बजा दी है। यह अध्ययन आरयूएसए 2.0 अनुदान के तहत गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर और टोक्यो मेट्रोपॉलिटन विश्वविद्यालय, जापान के सहयोग से किया गया।
इन जिलों में सबसे अधिक खतरा
शोध के अनुसार बठिंडा, मानसा, मोगा और बरनाला जिलों के भूजल में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा तय 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक पाई गई। बठिंडा और मानसा में 60 प्रतिशत से अधिक नमूने इस मानक से ऊपर दर्ज किए गए। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 200 फीट से कम गहराई वाले जल स्रोत सबसे अधिक प्रदूषित हैं, जिससे ग्रामीण आबादी पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
विज्ञापन
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
शोध में किए गए स्वास्थ्य जोखिम आकलन के अनुसार, यूरेनियम युक्त जल का लंबे समय तक सेवन करने से किडनी संबंधी रोगों, हड्डियों की कमजोरी और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या भविष्य में और विकराल रूप ले सकती है।
विज्ञापन
प्रदूषण के प्रमुख कारण
अध्ययन में यूरेनियम प्रदूषण के लिए प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग, भूजल का अंधाधुंध दोहन और औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्ट प्रवाह को जिम्मेदार माना गया है।
सतत जल प्रबंधन प्रमुख समाधान
शोध में यूरेनियम हटाने के लिए उन्नत नैनो-आधारित तकनीकों को आशाजनक बताया गया है लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए स्वच्छ सतही जल की उपलब्धता बढ़ाना और सतत जल प्रबंधन अपनाना आवश्यक है। सीटी विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर डॉ. मनबीर सिंह ने कहा कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं को जल संसाधनों की सुरक्षा और आम जनता के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। वहीं, डॉ. सतवीर सिंह ने स्पष्ट किया कि दक्षिण-पश्चिमी पंजाब का उथला भूजल फिलहाल पीने योग्य नहीं है और भविष्य की भूजल नीतियों के निर्धारण में यह शोध महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।