{"_id":"6a9c7a03baf747ca5705233c","slug":"the-curcumin-hidden-in-your-kitchen-turmeric-will-now-reach-your-body-more-effectively-chandigarh-news-c-16-pkl1049-1115354-2026-09-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: आपकी रसोई की हल्दी में छिपा करक्यूमिन अब पहुंचेगा शरीर तक बेहतर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: आपकी रसोई की हल्दी में छिपा करक्यूमिन अब पहुंचेगा शरीर तक बेहतर
विज्ञापन
विज्ञापन
चंडीगढ़। हल्दी भारतीय रसोई का अहम हिस्सा है लेकिन इसमें मौजूद करक्यूमिन पानी में आसानी से नहीं घुलता और शरीर में कम मात्रा में अवशोषित होता है। पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रो. इंदु पाल कौर और उनकी टीम ने इसी चुनौती को दूर करने की दिशा में अहम उपलब्धि हासिल की है। टीम ने करक्यूमिन को बेहद छोटे कणों में बदलकर ऐसा फॉर्मूला तैयार किया है जो पानी में आसानी से फैल सके और शरीर में बेहतर तरीके से उपलब्ध हो। इस तकनीक को अमेरिका का पेटेंट मिल गया है।
पीयू ने इस तकनीक को ‘कर्क्यूऑषध’ नाम दिया है। इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक की मदद से हल्दी के करक्यूमिन को शरीर के लिए अधिक उपलब्ध बनाना है। प्रयोगात्मक अध्ययन में टीम ने 20 एमएल का करक्यूमिन ओरल शॉट तैयार किया। साधारण करक्यूमिन पाउडर की तुलना में इस शॉट में करक्यूमिन की शरीर में उपलब्धता 900 गुना से अधिक पाई गई।
प्रो. कौर के अनुसार इस तकनीक पर करीब दो दशक से काम चल रहा था। अब इसे बड़े स्तर पर तैयार करने और व्यावसायिक उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाने की तैयारी है। हालांकि, अभी तक सामने आए परिणाम प्रयोगात्मक हैं और इन्हें मनुष्यों में किसी बीमारी के इलाज का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
विज्ञापन
पानी में नहीं घुलता था करक्यूमिन, यही थी सबसे बड़ी चुनौती
करक्यूमिन के जैविक गुणों पर लंबे समय से शोध हो रहा है लेकिन पानी में कम घुलनशीलता और शरीर में कम अवशोषण इसकी बड़ी चुनौती रही है। पीयू की तकनीक में करक्यूमिन को ठोस वसा यानी सॉलिड लिपिड से बने बेहद छोटे कणों में पैक किया गया है। इससे इसे पानी में फैलाना और स्थिर रखना आसान होता है। टीम ने ऐसी तकनीक भी विकसित की है, जिससे प्रति ग्राम नैनोकणों में करक्यूमिन की मात्रा करीब 1.5 से 2 गुना बढ़ाई जा सकती है। इससे पानी में मिलाकर पीने वाले सैशे ग्रैन्यूल तैयार किए गए। प्रयोगात्मक अध्ययन में इनसे साधारण करक्यूमिन की तुलना में करीब 890 गुना बेहतर रिलेटिव बायोएवेलेबिलिटी रिपोर्ट हुई।
ओरल शॉट और सैशे में विकसित हो रहा फॉर्मूला
तकनीक से तैयार फॉर्मूलेशन को ओरल शॉट और पानी में मिलाने वाले सैशे के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन्हें पानी, दूध या जूस जैसे पेय में मिलाया जा सकता है। तकनीक करक्यूमिन को रोशनी और पीएच में बदलाव से होने वाले नुकसान से बचाने में भी मदद करती है। इस उपलब्धि के साथ प्रो. इंदु पाल कौर के नाम 25 पेटेंट हो गए हैं, जिनमें तीन अमेरिकी पेटेंट शामिल हैं। इसके अलावा 22 अन्य पेटेंट आवेदन भी दाखिल किए गए हैं।
कोट..
पीयू का प्रयास शोध को लैब से निकालकर आम लोगों के लिए उपयोगी तकनीक में बदलना है। टीम को बधाई। -प्रो. मीनाक्षी गोयल, पीयू वीसी
पीयू ने इस तकनीक को ‘कर्क्यूऑषध’ नाम दिया है। इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक की मदद से हल्दी के करक्यूमिन को शरीर के लिए अधिक उपलब्ध बनाना है। प्रयोगात्मक अध्ययन में टीम ने 20 एमएल का करक्यूमिन ओरल शॉट तैयार किया। साधारण करक्यूमिन पाउडर की तुलना में इस शॉट में करक्यूमिन की शरीर में उपलब्धता 900 गुना से अधिक पाई गई।
विज्ञापन
प्रो. कौर के अनुसार इस तकनीक पर करीब दो दशक से काम चल रहा था। अब इसे बड़े स्तर पर तैयार करने और व्यावसायिक उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाने की तैयारी है। हालांकि, अभी तक सामने आए परिणाम प्रयोगात्मक हैं और इन्हें मनुष्यों में किसी बीमारी के इलाज का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
विज्ञापन
पानी में नहीं घुलता था करक्यूमिन, यही थी सबसे बड़ी चुनौती
करक्यूमिन के जैविक गुणों पर लंबे समय से शोध हो रहा है लेकिन पानी में कम घुलनशीलता और शरीर में कम अवशोषण इसकी बड़ी चुनौती रही है। पीयू की तकनीक में करक्यूमिन को ठोस वसा यानी सॉलिड लिपिड से बने बेहद छोटे कणों में पैक किया गया है। इससे इसे पानी में फैलाना और स्थिर रखना आसान होता है। टीम ने ऐसी तकनीक भी विकसित की है, जिससे प्रति ग्राम नैनोकणों में करक्यूमिन की मात्रा करीब 1.5 से 2 गुना बढ़ाई जा सकती है। इससे पानी में मिलाकर पीने वाले सैशे ग्रैन्यूल तैयार किए गए। प्रयोगात्मक अध्ययन में इनसे साधारण करक्यूमिन की तुलना में करीब 890 गुना बेहतर रिलेटिव बायोएवेलेबिलिटी रिपोर्ट हुई।
ओरल शॉट और सैशे में विकसित हो रहा फॉर्मूला
तकनीक से तैयार फॉर्मूलेशन को ओरल शॉट और पानी में मिलाने वाले सैशे के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन्हें पानी, दूध या जूस जैसे पेय में मिलाया जा सकता है। तकनीक करक्यूमिन को रोशनी और पीएच में बदलाव से होने वाले नुकसान से बचाने में भी मदद करती है। इस उपलब्धि के साथ प्रो. इंदु पाल कौर के नाम 25 पेटेंट हो गए हैं, जिनमें तीन अमेरिकी पेटेंट शामिल हैं। इसके अलावा 22 अन्य पेटेंट आवेदन भी दाखिल किए गए हैं।
कोट..
पीयू का प्रयास शोध को लैब से निकालकर आम लोगों के लिए उपयोगी तकनीक में बदलना है। टीम को बधाई। -प्रो. मीनाक्षी गोयल, पीयू वीसी