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'बुक्स या ड्रग्स' पर गोष्ठी, विशेषज्ञ बोले- जिंदगी अथाह समंदर, किताबों से दोस्ती करो, पार कर जाओगे
Mon, 04 Feb 2019 10:23 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 04 Feb 2019 10:23 AM IST
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'बुक्स या ड्रग्स' पर गोष्ठी
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जिंदगी एक अथाह समंदर और किताबों सच्ची दोस्त, जिसने इन्हें अपना लिया, वो जीवन में पार हो गया। वरना, लहरों के बवंडर में जो फंसा, वो डूब ही जाता है। ये कहना है जाने माने लेखक कैलाश अहलूवालिया का। वे बतौर मुख्यातिथि प्रेस क्लब चंडीगढ़ में आयोजित एक परिचर्चा में हिस्सा लेने के लिए आए थे। इसमें उनके अलावा चंडीगढ़ साहित्य संवाद मंच के अध्यक्ष प्रेम विज और भंडारी अदबी ट्रस्ट के अशोक नादिर ने गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर शिरकत की।
इसमें 'बुक्स या ड्रग्स' विषय पर, यानी जीवन में किताबों के महत्व और युवाओं में ड्रग्स की ओर खिंचाव पर बातचीत की गई। युवाओं में नशे की लत के कारणों और जिंदगी पर उसके पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तार से बताया। लेखक कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज का युवा वर्ग नशे की गर्त में जा रहा है, इसके लिए कहीं न कही परिवार के लोग जिम्मेदार हैं। क्योंकि युवाओं को परिवार में अपनेपन का और प्यार का माहौल नहीं मिलता। ऐसे में वे अकेले रह जाते हैं और तनावग्रस्त हो जाते हैं। यही तनाव उन्हें नशे की ओर खींचता है।
कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी किताबों से भी दूर होती जा रही है। टीवी, स्मार्टफोन, वीडियो गेम, इंटरनेट आदि का अत्यधिक उपयोग युवाओं की प्राथमिकता बन गई है। इससे युवा पीढ़ी की याद रखने की क्षमता, कल्पनाशक्ति, वैचारिक दृढ़ता व आत्मबल आदि में कमी आई है। इसके लिए आज की शिक्षा नीति जिम्मेदार है, जो ऑनलाइन व सोशल मीडिया आधारित है। ऐसा होने से किताबें पढ़ने की प्रवृति खत्म हो गई है। छोटे-छोटे बच्चों को भी इंटरनेट पर आधारित होमवर्क या प्रोजेक्ट दिए जा रहे हैं।
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कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज पढ़ाई करने का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है। पढ़ाने का उद्देश्य भी सिर्फ पैसा कमाना है। सिलेबस के अलावा, पुस्तक पढ़ने की आदत खत्म हो गई है। इसीलिए आज के युवा नशे में आनन्द की तलाश कर रहे हैं, दोस्तों की संगत ढूंढ रहे हैं। जो अकसर गलत ही साबित होती है, जबकि वास्तविकता तो ये है कि पुस्तकें युवाओं की सच्ची मित्र हैं। जिसने किताबों को दोस्त बना लिया, वो जिंदगी के समंदर को पार कर गया, वरना समंदर में जो डूबा वो लौटकर नहीं आया।
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इसमें 'बुक्स या ड्रग्स' विषय पर, यानी जीवन में किताबों के महत्व और युवाओं में ड्रग्स की ओर खिंचाव पर बातचीत की गई। युवाओं में नशे की लत के कारणों और जिंदगी पर उसके पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तार से बताया। लेखक कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज का युवा वर्ग नशे की गर्त में जा रहा है, इसके लिए कहीं न कही परिवार के लोग जिम्मेदार हैं। क्योंकि युवाओं को परिवार में अपनेपन का और प्यार का माहौल नहीं मिलता। ऐसे में वे अकेले रह जाते हैं और तनावग्रस्त हो जाते हैं। यही तनाव उन्हें नशे की ओर खींचता है।
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कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी किताबों से भी दूर होती जा रही है। टीवी, स्मार्टफोन, वीडियो गेम, इंटरनेट आदि का अत्यधिक उपयोग युवाओं की प्राथमिकता बन गई है। इससे युवा पीढ़ी की याद रखने की क्षमता, कल्पनाशक्ति, वैचारिक दृढ़ता व आत्मबल आदि में कमी आई है। इसके लिए आज की शिक्षा नीति जिम्मेदार है, जो ऑनलाइन व सोशल मीडिया आधारित है। ऐसा होने से किताबें पढ़ने की प्रवृति खत्म हो गई है। छोटे-छोटे बच्चों को भी इंटरनेट पर आधारित होमवर्क या प्रोजेक्ट दिए जा रहे हैं।
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कैलाश अहलूवालिया ने कहा कि आज पढ़ाई करने का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है। पढ़ाने का उद्देश्य भी सिर्फ पैसा कमाना है। सिलेबस के अलावा, पुस्तक पढ़ने की आदत खत्म हो गई है। इसीलिए आज के युवा नशे में आनन्द की तलाश कर रहे हैं, दोस्तों की संगत ढूंढ रहे हैं। जो अकसर गलत ही साबित होती है, जबकि वास्तविकता तो ये है कि पुस्तकें युवाओं की सच्ची मित्र हैं। जिसने किताबों को दोस्त बना लिया, वो जिंदगी के समंदर को पार कर गया, वरना समंदर में जो डूबा वो लौटकर नहीं आया।
त्रिकोणीय प्रेम पर आधारित किताब का विमोचन भी किया गया
किताब का विमोचन
दूसरी ओर, इस गोष्ठी के दौरान मशहूर लेखक व समाज सेवी आयुष्मान सिन्हा की किताब 'आई डी फिक्सी- लव प्राइड एंड प्रेज्यूडिस' का विमोचन भी किया गया। यह लेखक सिन्हा की दूसरी हिस्टोरिकल फिक्शन बुक है। पेशे से आयुष्मान एक आईटी विशेषज्ञ हैं। मूलरूप से लखनऊ के रहने वाले आयुष्मान सिन्हा अब तक दो किताबें लिख चुके हैं। उनकी पहली किताब कैंडल्स इन द विंड थी। वहीं उनकी इस किताब में रोमांच के साथ मानसिक द्वंद्व दिखाया गया है।
आयुष्मान सिन्हा ने बताया कि यह नावेल प्यार, सफलता और दया व करुणा की भावनाओं को दर्शाता है। यह तीन चरित्रों पर आधारित है- अद्रत, तीक्षिया और विहान हैं। नावेल की कहानी वर्ष 1947 से 1980 तक की है। नावेल में उस समय के लोगों की भावनाओं और आस्था का चित्रण करती है। उस समय के लोगों के आत्मसम्मान और पैशन को भी प्रतिबिंबित करती है। यह उन तीन लोगों की कहानी है, जो अपनी खुद की पहचान कायम करना चाहते हैं, अपना भविष्य अपनी किस्मत खुद लिखना चाहते हैं।
इस जद्दोजहद में उनका जीवन ऐसी परिस्थितियों में उलझ जाता है, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं होता। वे प्यार, सफलता और सहानुभूति में से किसी एक पर अटूट विश्वास रखते हैं और उसके लिए बाकी सब का त्याग कर देते हैं, यानी एक के लिए प्यार जरूरी है, तो दूसरे के लिए सफलता और तीसरा दया व करुणा की मूर्त है। आखिरी में जीत होती है, प्यार की, जिसमें रोमांस बिल्कुल नहीं है, लेकिन एक अपनापन है। आइडी फिक्से उन लोगों की कहानी है, जो जिंदगी में प्यार को ही सब कुछ मानते हैं।
आयुष्मान सिन्हा ने बताया कि यह नावेल प्यार, सफलता और दया व करुणा की भावनाओं को दर्शाता है। यह तीन चरित्रों पर आधारित है- अद्रत, तीक्षिया और विहान हैं। नावेल की कहानी वर्ष 1947 से 1980 तक की है। नावेल में उस समय के लोगों की भावनाओं और आस्था का चित्रण करती है। उस समय के लोगों के आत्मसम्मान और पैशन को भी प्रतिबिंबित करती है। यह उन तीन लोगों की कहानी है, जो अपनी खुद की पहचान कायम करना चाहते हैं, अपना भविष्य अपनी किस्मत खुद लिखना चाहते हैं।
इस जद्दोजहद में उनका जीवन ऐसी परिस्थितियों में उलझ जाता है, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं होता। वे प्यार, सफलता और सहानुभूति में से किसी एक पर अटूट विश्वास रखते हैं और उसके लिए बाकी सब का त्याग कर देते हैं, यानी एक के लिए प्यार जरूरी है, तो दूसरे के लिए सफलता और तीसरा दया व करुणा की मूर्त है। आखिरी में जीत होती है, प्यार की, जिसमें रोमांस बिल्कुल नहीं है, लेकिन एक अपनापन है। आइडी फिक्से उन लोगों की कहानी है, जो जिंदगी में प्यार को ही सब कुछ मानते हैं।