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‘शतरंज के खिलाड़ी’ में दिखा राजाओं का विलासी जीवन
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 21 Mar 2017 09:46 AM IST
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‘शतरंज के खिलाड़ी’ में दिखा राजाओं की विलासी जीवन
- फोटो : अमर उजाला
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पंजाब संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित दो दिवसीय थिएटर फेस्टिवल में सोमवार को शतरंज के खिलाड़ी नाटक का मंचन किया गया। उपन्यासकार प्रेमचंद के लिखे नाटक का मंचन थिएटर फार थिएटर ग्रुप की ओर से पंजाबी भाषा में किया गया। इसका निर्देशन गुरप्रीत भुल्लर ने किया। 50 मिनट के नाटक में कलाकारों ने शानदार प्रस्तुति दी।
नाटक में दिखाया गया कि लखनऊ शहर में राजनीतिक सामाजिक चेतना शून्य हो गई है। यहां के राजा और नवाब भोग विलास में डूबे हुए हैं। कहानी के अनुसार मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली दोनों वाजिद अली शाह के जागीरदार हैं। जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें कोई परवाह नहीं है। दोनों गहरे मित्र हैं और शतरंज खेलना उनका मुख्य काम है। दोनों को समय पर नाश्ता, खाना, पान और तंबाकू उपलब्ध होता है। एक दिन मिर्जा सज्जाद अली की बीवी बीमार हो जाती हैं। वह तब भी शतरंज के खेल में लिप्त होते है और अपनी बीवी का इलाज नहीं कराते हैं। तंग आकर उनकी बीवी शतरंज को बाहर फेंक देती हैं।
इसकेे बाद शतरंज का खेल मीर रौशन अली के घर में होने लगता है। रोज-रोज के इस खेल से उनकी बीवी भी परेशान हो जाती है। एक दिन दोनों मित्र शतरंज की बाजियों में खोये हुए थे कि उसी समय बादशाही फौज का एक अफसर मीर साहब का नाम पूछता हुआ आ खड़ा होता है। उसे देखते ही मीर साहब के होश उड़ गए। वह शाही अफसर मीर साहब के नौकरों पर खूब रोब गालिब करता है। मीर के न होने की बात सुनकर अगले दिन आने की बात करता है। इस प्रकार यह तमाशा खत्म होता है।
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नाटक में दिखाया गया कि लखनऊ शहर में राजनीतिक सामाजिक चेतना शून्य हो गई है। यहां के राजा और नवाब भोग विलास में डूबे हुए हैं। कहानी के अनुसार मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली दोनों वाजिद अली शाह के जागीरदार हैं। जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें कोई परवाह नहीं है। दोनों गहरे मित्र हैं और शतरंज खेलना उनका मुख्य काम है। दोनों को समय पर नाश्ता, खाना, पान और तंबाकू उपलब्ध होता है। एक दिन मिर्जा सज्जाद अली की बीवी बीमार हो जाती हैं। वह तब भी शतरंज के खेल में लिप्त होते है और अपनी बीवी का इलाज नहीं कराते हैं। तंग आकर उनकी बीवी शतरंज को बाहर फेंक देती हैं।
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इसकेे बाद शतरंज का खेल मीर रौशन अली के घर में होने लगता है। रोज-रोज के इस खेल से उनकी बीवी भी परेशान हो जाती है। एक दिन दोनों मित्र शतरंज की बाजियों में खोये हुए थे कि उसी समय बादशाही फौज का एक अफसर मीर साहब का नाम पूछता हुआ आ खड़ा होता है। उसे देखते ही मीर साहब के होश उड़ गए। वह शाही अफसर मीर साहब के नौकरों पर खूब रोब गालिब करता है। मीर के न होने की बात सुनकर अगले दिन आने की बात करता है। इस प्रकार यह तमाशा खत्म होता है।
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थिएटर फार थिएटर ग्रुप ने किया मंचन
‘शतरंज के खिलाड़ी’ में दिखा राजाओं की विलासी जीवन
- फोटो : अमर उजाला
दोनों मित्र शतरंज के खेल को खेलने के लिए गोमती के किनारे पर एक विरान मस्जिद में चले जाते हैं। अपने साथ वह जरूरी सामान हुक्का, चिलम और दरी भी ले जाते हैं। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा।
एक दिन अचानक मीर साहब ने देखा कि अंग्रेजी फौज गोमती के किनारे-किनारे चली आ रही है। उन्होंने मिर्जा को हड़बड़ी में यह बात बताई। कुछ समय में ही नवाब वाजिद अली शाह कैद कर लिए गए। उसी रास्ते अंग्रेजी सेना विजयी-भाव से लौट रही थी। अवध का इतना बड़ा नवाब चुपचाप सर झुकाए चला जा रहा था। सज्जाद और रौशन दोनों इस नवाब के जागीरदार थे।
नवाब की रक्षा में इन्हें अपनी जान की बाजी लगा देनी चाहिए। थोड़ी ही देर बाद खेल की बाजी में ये दोनों मित्र उलझ पड़े। बात खानदान और रईसी तक आ पहुँची। गाली-गलौज होने लगी। दोनों कटार और तलवार रखते थे। दोनों ने तलवारें निकालीं और एक दूसरे को दे मारीं। दोनों का अंत के साथ ही नाटक का भी अंत हो गया।
एक दिन अचानक मीर साहब ने देखा कि अंग्रेजी फौज गोमती के किनारे-किनारे चली आ रही है। उन्होंने मिर्जा को हड़बड़ी में यह बात बताई। कुछ समय में ही नवाब वाजिद अली शाह कैद कर लिए गए। उसी रास्ते अंग्रेजी सेना विजयी-भाव से लौट रही थी। अवध का इतना बड़ा नवाब चुपचाप सर झुकाए चला जा रहा था। सज्जाद और रौशन दोनों इस नवाब के जागीरदार थे।
नवाब की रक्षा में इन्हें अपनी जान की बाजी लगा देनी चाहिए। थोड़ी ही देर बाद खेल की बाजी में ये दोनों मित्र उलझ पड़े। बात खानदान और रईसी तक आ पहुँची। गाली-गलौज होने लगी। दोनों कटार और तलवार रखते थे। दोनों ने तलवारें निकालीं और एक दूसरे को दे मारीं। दोनों का अंत के साथ ही नाटक का भी अंत हो गया।