{"_id":"698357015550649b760508ac","slug":"summoning-senior-officials-without-their-direct-involvement-is-an-abuse-of-the-judicial-process-high-court-chandigarh-news-c-16-1-pkl1098-940836-2026-02-04","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिना प्रत्यक्ष भूमिका वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग: हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बिना प्रत्यक्ष भूमिका वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग: हाईकोर्ट
विज्ञापन
-केवल ध्यान आकर्षित करने या मुकदमे को लटकाने के उद्देश्य से उन्हें तलब करना गलत
-लुधियाना के पुलिस आयुक्त को ट्रायल कोर्ट ने गवाह के तौर पर पेश होने का दिया था आदेश
-- -
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जिला अदालतों द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बिना ठोस आधार के बचाव पक्ष के गवाह के रूप में तलब किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन अधिकारियों की किसी मामले की जांच में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है, उन्हें केवल ध्यान आकर्षित करने या मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने के उद्देश्य से तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें जालंधर की एक अदालत ने लुधियाना के पुलिस आयुक्त स्वपन शर्मा को एनडीपीएस केस में गवाह के रूप में पेश होने का आदेश दिया था। यह मामला जालंधर कमिश्नरेट पुलिस की ओर से चलाए गए दो माह लंबे विशेष अभियान से जुड़ा है जिसके तहत मार्च 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया था। यह नेटवर्क कूरियर माध्यम से ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक फैला हुआ था।
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील और ट्रायल कोर्ट दोनों को फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह के आदेश न केवल न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालते हैं, बल्कि एनडीपीएस जैसे समयबद्ध मामलों को जानबूझकर लटकाने का जरिया भी बनते हैं। खुली अदालत में पीठ ने सवाल किया कि जब पुलिस आयुक्त का मामले की जांच से कोई सीधा सरोकार नहीं है, तो उन्हें तलब करने की आवश्यकता क्या है।
विज्ञापन
कोर्ट ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ईमानदार और गैर-जांचकर्ता अधिकारियों को मीडिया सुर्खियों या देरी की रणनीति के तहत कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि पुलिस आयुक्त की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने के अनुरोध पर ट्रायल कोर्ट ने विचार नहीं किया। समन आदेश के बाद हुई मीडिया रिपोर्टिंग पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इससे जनविश्वास और पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने जालंधर अदालत के समन आदेश पर तत्काल रोक लगा दी।
विज्ञापन
-लुधियाना के पुलिस आयुक्त को ट्रायल कोर्ट ने गवाह के तौर पर पेश होने का दिया था आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जिला अदालतों द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बिना ठोस आधार के बचाव पक्ष के गवाह के रूप में तलब किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन अधिकारियों की किसी मामले की जांच में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है, उन्हें केवल ध्यान आकर्षित करने या मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने के उद्देश्य से तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें जालंधर की एक अदालत ने लुधियाना के पुलिस आयुक्त स्वपन शर्मा को एनडीपीएस केस में गवाह के रूप में पेश होने का आदेश दिया था। यह मामला जालंधर कमिश्नरेट पुलिस की ओर से चलाए गए दो माह लंबे विशेष अभियान से जुड़ा है जिसके तहत मार्च 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया था। यह नेटवर्क कूरियर माध्यम से ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक फैला हुआ था।
विज्ञापन
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील और ट्रायल कोर्ट दोनों को फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह के आदेश न केवल न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालते हैं, बल्कि एनडीपीएस जैसे समयबद्ध मामलों को जानबूझकर लटकाने का जरिया भी बनते हैं। खुली अदालत में पीठ ने सवाल किया कि जब पुलिस आयुक्त का मामले की जांच से कोई सीधा सरोकार नहीं है, तो उन्हें तलब करने की आवश्यकता क्या है।
विज्ञापन
कोर्ट ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ईमानदार और गैर-जांचकर्ता अधिकारियों को मीडिया सुर्खियों या देरी की रणनीति के तहत कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि पुलिस आयुक्त की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने के अनुरोध पर ट्रायल कोर्ट ने विचार नहीं किया। समन आदेश के बाद हुई मीडिया रिपोर्टिंग पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इससे जनविश्वास और पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने जालंधर अदालत के समन आदेश पर तत्काल रोक लगा दी।