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छात्र हो या बेरोजगार, गुजारा भत्ता देना होगा: हाईकोर्ट ने कहा-क्षमता है तो जिम्मेदारी से नहीं बच सकता पति

Wed, 15 Apr 2026 10:19 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Wed, 15 Apr 2026 10:19 AM IST
सार

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि पति द्वारा “आय नहीं होने” का तर्क केवल एक बहाना है, जिसे कानून में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि एक स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति के लिए कमाई करना संभव है और पत्नी का भरण-पोषण करना उसका कानूनी दायित्व है।

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Student or Unemployed Maintenance Allowance Must Be Paid High Court Rules
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति अपनी पत्नी के गुजारा भत्ता की कानूनी जिम्मेदारी से केवल इस आधार पर मुक्त नहीं हो सकता कि वह छात्र है या आर्थिक रूप से कमजोर है। अदालत ने कहा कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है और कमाने की क्षमता रखता है, तो पत्नी के प्रति उसका दायित्व पूर्ण और अनिवार्य है।
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यह टिप्पणी जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की एकल पीठ ने एक 22 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र की याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने फरीदाबाद की फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त 2025 में पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को 2500 प्रति माह अंतरिम गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए गए थे।
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मामले के अनुसार, दोनों की शादी जून 2020 में हुई थी, जब पति नाबालिग था और पत्नी 25 वर्ष की थी। बाद में पति ने वर्ष 2023 में विवाह निरस्तीकरण के लिए याचिका दायर की, जिसके बाद पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की।
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याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि वह एक छात्र है और उसकी मां की 3000 की विधवा पेंशन पर ही पूरा परिवार निर्भर है। साथ ही, उसने यह भी कहा कि पत्नी अपने मायके में रह रही है और उसके भाई कमाने वाले हैं, इसलिए उसे भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं है।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता का परविधान पति को दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी को दर-दर की ठोकरों और आर्थिक तंगी से बचाने के लिए बनाया गया है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि पति द्वारा “आय नहीं होने” का तर्क केवल एक बहाना है, जिसे कानून में स्वीकार नहीं किया जा सकता। 

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि एक स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति के लिए कमाई करना संभव है और पत्नी का भरण-पोषण करना उसका कानूनी दायित्व है। फैमिली कोर्ट द्वारा पति की ‘शून्य आय’ की दलील को नजरअंदाज करना सही ठहराते हुए अदालत ने कहा कि एक दिहाड़ी मजदूर भी आसानी से 12-13 हजार मासिक कमा सकता है। गुजारा भत्ता की राशि पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि महंगाई के इस दौर में 2500 प्रति माह की राशि भी पत्नी के बुनियादी जरूरतों के लिए मुश्किल से पर्याप्त है। ऐसे में इसे कम करने का कोई आधार नहीं बनता।


अंतत हाई कोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और स्पष्ट संदेश दिया कि वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न जिम्मेदारियों से कोई भी व्यक्ति बच नहीं सकता।
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