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Multiple Personality Disorder: चपेट में हर पांच में से एक युवा, बचपन का उत्पीड़न है बड़ी वजह, दें विशेष ध्यान
Sun, 05 Mar 2023 04:27 PM IST
निवेदिता वर्मा
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sun, 05 Mar 2023 04:27 PM IST
सार
पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रो. आदर्श कोहली का कहना है कि इस मर्ज के मरीज हमारे आपके बीच में होते हैं। जो गाहे-बगाहे अपने अन्य व्यक्तित्व से भी रूबरू कराते रहते हैं। लेकिन खुद उससे अनजान होते हैं। ऐसे में बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
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बहुव्यक्तित्व विकार
- फोटो : प्रतीकात्मक
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विस्तार
आपको अपरिचित या कार्तिक कॉलिंग कार्तिक फिल्म याद है। इसमें एक व्यक्ति के अंदर कई सारे व्यक्तित्व जीवित थे। लेकिन उस व्यक्ति को उसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। यह सिर्फ इक्का-दुक्का फिल्मों के चरित्रों तक ही सीमित नहीं है। हमारे आस-पास या हमारे अपनों में बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस तरह के व्यक्तित्व को जी रहे हैं। अगर सही शब्दों में कहें तो वे अनजाने में एक गंभीर मर्ज की चपेट में हैं। जिसे बहुतव्यक्तित्व विकार या मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसआर्डर कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार पांच में से एक युवा इसकी चपेट में है। इसके लिए बचपन में हुई कोई घटना या उत्पीड़न ज्यादा हद तक जिम्मेदार हैं। क्योंकि बच्चा उससे बाहर नहीं निकल पाता।
पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रो. आदर्श कोहली का कहना है कि इस मर्ज के मरीज हमारे आपके बीच में होते हैं। जो गाहे-बगाहे अपने अन्य व्यक्तित्व से भी रूबरू कराते रहते हैं। लेकिन खुद उससे अनजान होते हैं। ऐसे में बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। वहीं विभाग के ही डॉ. राहुल चक्रवर्ती ने बताया कि खासतौर पर माता-पिता बच्चों की परेशानी को गंभीरता से लें। अगर बच्चा कोई बात बताना चाह रहा हो तो उसे नजरअंदाज करने की बजाय प्यार से जानने का प्रयास करें। बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताए। उन्हें गलत और सही का फर्क बताए। उनके सामने अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखें। अगर बच्चे के साथ कोई गंभीर वाकया हो गया हो तो उसे उससे बाहर निकालने का प्रयास करें। कोई समस्या हो जाए तो झांड़-फूंक जैसी चीजों में फंसने के बजाय डॉक्टर के पास जाएं।
केस- 1
22 वर्षीय आकांक्षा (बदला हुआ नाम) को उसके परिजन पीजीआई के मनोरोग विभाग की ओपीडी में लेकर पहुंचे। डॉक्टर के पास जाने से पहले तक तो आकांक्षा सामान्य व्यवहार कर रही थी। लेकिन डॉक्टर को देखते ही वह भड़क गई। चिखने लगी और बोली अब तू बचेगा नहीं। मैं तेरा विनाश करूंगी। तूने मुझे बहुत परेशान किया है। अब तेरी बारी है। ऐसा लगभग 30 मिनट तक चलता रहा। फिर उसका व्यवहार सामान्य हो गया। खास बात यह है कि सामान्य होने के बाद आकांक्षा को अपने उस व्यवहार के बारे में कुछ भी याद नहीं था।
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केस- 2
राकेश (बदला हुआ नाम) लॉ की पढ़ाई करने के लिए एक साल पहले चंडीगढ़ आया। हॉस्टल में रहने के दौरान उसके दोस्तों ने उसके व्यवहार में कई बार खतरनाक बदलाव पाए। दोस्तों के पूछने पर उसने बताया कि उस पर कोई साया है, जो उसे परेशान करता है। उससे बचाव के लिए गांव में काफी झांड-फूंक भी कराया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। राकेश ने दोस्तों के कहने पर खुद को पीजीआई में दिखाया, तब जाकर पता चला कि जिसे वे और उसका परिवार भूत-प्रेत का साया मानते थे वो एक मानसिक विकार है। जिसे ठीक किया जा सकता है।
आप भी जान लें ये मर्ज
बहुव्यक्तित्व विकार एक ऐसी समस्या है जिसमें कोई व्यक्ति दो या दो से ज्यादा पहचान लिए जीने लगता है। ये सभी पहचान एक दूसरे से अलग होती हैं। चिकित्सकीय भाषा में इसे डिसोशिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर भी कहा जाता है। डिसोशिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर के कारण एक ही व्यक्ति एक समय पर अलग-अलग पहचान से बर्ताव कर सकता है। यह एक बहुत ही गंभीर मानसिक स्थिति भी मानी जाती है। इसके कारण मरीज अपनी और अपने परिवार के लिए कभी भी खतरा उत्पन्न कर सकता है।
लक्षणों पर करें गौर
- समय का पता न लगना
- मन में हमेशा उलझन या भ्रम की स्थिति बनी रहना
- याददाश्त का कमजोर होना
- सामान्य से अलग व्यवहार करना
- एक से ज्यादा व्यक्तित्व का प्रदर्शन
- अलगाव की भावना
ये कारण हैं जिम्मेदार
अधिकतर लोगों में मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की समस्या उनके बचपन के अनुभवों की वजह से विकसित हो सकती है। डॉ. राहुल के अनुसार, जिन बच्चों के साथ बचपन में मानसिक तनाव, यौन उत्पीड़न और मारपीट की घटना हुई होती है उन्हें आगे चलकर मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर होने का खतरा रहता है। यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। इसलिए खासतौर पर बच्चों पर किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक दबाव बनाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।
बचाव है संभव
- रोगी को उसकी स्थिति के बारे में बताया जाता है
- मानसिक रूप से अलग-अलग भावनाओं को सहने की शक्ति बढ़ाई जाती है
- प्रभावशाली व्यवहार को नियंत्रित करने पर काम करते हैं
- भविष्य में दोबारा से अलगाव की भावना ना आये
- समय और तनाव प्रबंधन पर जोर
- रिश्तों में सुधार की सीख
यह मर्ज बहुत गंभीर है। इससे ग्रस्त व्यक्ति एक ही शरीर में दर्जनों व्यक्तित्व को लेकर घुमता है। इसका इलाज संभव है। इसलिए लक्षणों को गंभीरता से लेते हुए समय रहते विशेषज्ञ को दिखाए। विशेष बात यह है कि इससे बचाव के लिए बच्चों पर दबाव बनाने या उन्हें प्रताड़ित करने जैसी चीजों पर रोक सबसे ज्यादा जरूरी है। - डॉ. आदर्श कोहली, पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रोफेसर
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पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रो. आदर्श कोहली का कहना है कि इस मर्ज के मरीज हमारे आपके बीच में होते हैं। जो गाहे-बगाहे अपने अन्य व्यक्तित्व से भी रूबरू कराते रहते हैं। लेकिन खुद उससे अनजान होते हैं। ऐसे में बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। वहीं विभाग के ही डॉ. राहुल चक्रवर्ती ने बताया कि खासतौर पर माता-पिता बच्चों की परेशानी को गंभीरता से लें। अगर बच्चा कोई बात बताना चाह रहा हो तो उसे नजरअंदाज करने की बजाय प्यार से जानने का प्रयास करें। बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताए। उन्हें गलत और सही का फर्क बताए। उनके सामने अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखें। अगर बच्चे के साथ कोई गंभीर वाकया हो गया हो तो उसे उससे बाहर निकालने का प्रयास करें। कोई समस्या हो जाए तो झांड़-फूंक जैसी चीजों में फंसने के बजाय डॉक्टर के पास जाएं।
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केस- 1
22 वर्षीय आकांक्षा (बदला हुआ नाम) को उसके परिजन पीजीआई के मनोरोग विभाग की ओपीडी में लेकर पहुंचे। डॉक्टर के पास जाने से पहले तक तो आकांक्षा सामान्य व्यवहार कर रही थी। लेकिन डॉक्टर को देखते ही वह भड़क गई। चिखने लगी और बोली अब तू बचेगा नहीं। मैं तेरा विनाश करूंगी। तूने मुझे बहुत परेशान किया है। अब तेरी बारी है। ऐसा लगभग 30 मिनट तक चलता रहा। फिर उसका व्यवहार सामान्य हो गया। खास बात यह है कि सामान्य होने के बाद आकांक्षा को अपने उस व्यवहार के बारे में कुछ भी याद नहीं था।
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केस- 2
राकेश (बदला हुआ नाम) लॉ की पढ़ाई करने के लिए एक साल पहले चंडीगढ़ आया। हॉस्टल में रहने के दौरान उसके दोस्तों ने उसके व्यवहार में कई बार खतरनाक बदलाव पाए। दोस्तों के पूछने पर उसने बताया कि उस पर कोई साया है, जो उसे परेशान करता है। उससे बचाव के लिए गांव में काफी झांड-फूंक भी कराया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। राकेश ने दोस्तों के कहने पर खुद को पीजीआई में दिखाया, तब जाकर पता चला कि जिसे वे और उसका परिवार भूत-प्रेत का साया मानते थे वो एक मानसिक विकार है। जिसे ठीक किया जा सकता है।
आप भी जान लें ये मर्ज
बहुव्यक्तित्व विकार एक ऐसी समस्या है जिसमें कोई व्यक्ति दो या दो से ज्यादा पहचान लिए जीने लगता है। ये सभी पहचान एक दूसरे से अलग होती हैं। चिकित्सकीय भाषा में इसे डिसोशिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर भी कहा जाता है। डिसोशिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर के कारण एक ही व्यक्ति एक समय पर अलग-अलग पहचान से बर्ताव कर सकता है। यह एक बहुत ही गंभीर मानसिक स्थिति भी मानी जाती है। इसके कारण मरीज अपनी और अपने परिवार के लिए कभी भी खतरा उत्पन्न कर सकता है।
लक्षणों पर करें गौर
- समय का पता न लगना
- मन में हमेशा उलझन या भ्रम की स्थिति बनी रहना
- याददाश्त का कमजोर होना
- सामान्य से अलग व्यवहार करना
- एक से ज्यादा व्यक्तित्व का प्रदर्शन
- अलगाव की भावना
ये कारण हैं जिम्मेदार
अधिकतर लोगों में मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की समस्या उनके बचपन के अनुभवों की वजह से विकसित हो सकती है। डॉ. राहुल के अनुसार, जिन बच्चों के साथ बचपन में मानसिक तनाव, यौन उत्पीड़न और मारपीट की घटना हुई होती है उन्हें आगे चलकर मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर होने का खतरा रहता है। यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। इसलिए खासतौर पर बच्चों पर किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक दबाव बनाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।
बचाव है संभव
- रोगी को उसकी स्थिति के बारे में बताया जाता है
- मानसिक रूप से अलग-अलग भावनाओं को सहने की शक्ति बढ़ाई जाती है
- प्रभावशाली व्यवहार को नियंत्रित करने पर काम करते हैं
- भविष्य में दोबारा से अलगाव की भावना ना आये
- समय और तनाव प्रबंधन पर जोर
- रिश्तों में सुधार की सीख
यह मर्ज बहुत गंभीर है। इससे ग्रस्त व्यक्ति एक ही शरीर में दर्जनों व्यक्तित्व को लेकर घुमता है। इसका इलाज संभव है। इसलिए लक्षणों को गंभीरता से लेते हुए समय रहते विशेषज्ञ को दिखाए। विशेष बात यह है कि इससे बचाव के लिए बच्चों पर दबाव बनाने या उन्हें प्रताड़ित करने जैसी चीजों पर रोक सबसे ज्यादा जरूरी है। - डॉ. आदर्श कोहली, पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रोफेसर