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तस्करों ने खैर के एक दर्जन पेड़ काटे
ब्यूरा/अमर उजाला/ यमुनानगर।
Updated Fri, 29 Aug 2014 01:02 AM IST
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यमुनानगर/खिजराबाद। तस्करों ने भूडकलां हर्बल पार्क से लगते जंगल से बुधवार को करीब एक दर्जन खैर के पेड़ काट लिए। इस मामले की वन कर्मियों को भनक तक नहीं लगी। जंगल में पशु चराने आए ग्रामीणों ने वीरवार सुबह कटे हुए खैर के पेड़ों को देखा और इसकी सूचना वन विभाग को दी।
ग्रामीणों की सूचना के आधार पर विभाग ने कार्रवाई करते हुए डैमेज रिपोर्ट काट दी और कर्मचारियों ने मौके पर आकर छानबीन शुरू कर दी। कटे हुए पेड़ों को देखकर ऐसा लग रहा था कि इन्हें कुछ समय पहले काटा गया है।
चार हजार रुपये प्रति क्विंटल में बिकती है खैर
कलेसर जंगल और आसपास के इलाकों में खैर के पेड़ काफी संख्या में है। इसका इस्तेमाल कत्था बनाने में किया जाता है। इस कारण खैर की कीमत काफी अधिक होती है। बाजार में खैर की लकड़ी करीब चार हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकती है। महंगी होने के कारण इलाके में खैर की तस्करी काफी अरसे से की जा रही है। वन विभाग इस पर अंकुश लगाने में नाकामयाब साबित हो रहा है।
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पहले भी काटे जाते रहे हैं पेड़
अराईयांवाला,ताजेवाला, भूड़कलां आदि ऐसी कई जगह हैं जहां से तस्कर खैर के कीमती पेड़ काट रहे हैं। ये काम वन विभाग की लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। कुछ दिन पहले कुटीपुर के जंगल से हजारों रुपये की कीमत के खैर के पेड़ काट लिए गए थे। मीडिया कर्मियों के बताने पर ही वन विभाग के कर्मचारियों को इसकी सूचना लगी और डैमेज रिपोर्ट काट दी गई। टिबडियों बीट से भी तस्कर खैर की लकड़ी को काटकर मार्केट में महंगे दामों पर बेचते रहे हैं। वही कुछ समय पहले ताजेवाला से भी खैर तस्करों ने खैर के लगभग दो दर्जन से अधिक पेड़ों को काटा गया। भूडकलां और डांडीपुर से नहर के किनारे पर से भी खैर के दर्जनों पेड़ों को काटकर मार्केट में बेचा जा चुका है। बीट में तैनात वन कर्मी यही कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि कटे पेड़ों की डैमेज रिपोर्ट बना दी गई है और तस्करों की तलाश जारी है।
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ग्रामीणों की सूचना के आधार पर विभाग ने कार्रवाई करते हुए डैमेज रिपोर्ट काट दी और कर्मचारियों ने मौके पर आकर छानबीन शुरू कर दी। कटे हुए पेड़ों को देखकर ऐसा लग रहा था कि इन्हें कुछ समय पहले काटा गया है।
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चार हजार रुपये प्रति क्विंटल में बिकती है खैर
कलेसर जंगल और आसपास के इलाकों में खैर के पेड़ काफी संख्या में है। इसका इस्तेमाल कत्था बनाने में किया जाता है। इस कारण खैर की कीमत काफी अधिक होती है। बाजार में खैर की लकड़ी करीब चार हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकती है। महंगी होने के कारण इलाके में खैर की तस्करी काफी अरसे से की जा रही है। वन विभाग इस पर अंकुश लगाने में नाकामयाब साबित हो रहा है।
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पहले भी काटे जाते रहे हैं पेड़
अराईयांवाला,ताजेवाला, भूड़कलां आदि ऐसी कई जगह हैं जहां से तस्कर खैर के कीमती पेड़ काट रहे हैं। ये काम वन विभाग की लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। कुछ दिन पहले कुटीपुर के जंगल से हजारों रुपये की कीमत के खैर के पेड़ काट लिए गए थे। मीडिया कर्मियों के बताने पर ही वन विभाग के कर्मचारियों को इसकी सूचना लगी और डैमेज रिपोर्ट काट दी गई। टिबडियों बीट से भी तस्कर खैर की लकड़ी को काटकर मार्केट में महंगे दामों पर बेचते रहे हैं। वही कुछ समय पहले ताजेवाला से भी खैर तस्करों ने खैर के लगभग दो दर्जन से अधिक पेड़ों को काटा गया। भूडकलां और डांडीपुर से नहर के किनारे पर से भी खैर के दर्जनों पेड़ों को काटकर मार्केट में बेचा जा चुका है। बीट में तैनात वन कर्मी यही कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि कटे पेड़ों की डैमेज रिपोर्ट बना दी गई है और तस्करों की तलाश जारी है।