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समझौता एक्सप्रेस में हुए थे दो धमाके, आग लगी और मच गई चीख पुकार, 68 लोगों ने गंवाई थी जान

Thu, 21 Mar 2019 01:18 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पंचकूला (हरियाणा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पंचकूला (हरियाणा) Published by: ajay kumar Updated Thu, 21 Mar 2019 01:18 AM IST
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Side Story of samjhauta express blast case
समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट - फोटो : File Photo

18 फरवरी 2007 को भारत-पाक के बीच सप्ताह में दो दिन चलने वाली ट्रेन संख्या 4001 अप अटारी समझौता एक्सप्रेस में दो आईईडी धमाके हुए। जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा रात 11.53 बजे दिल्ली से करीब 80 किलोमीटर दूर पानीपत के दिवाना रेलवे स्टेशन के पास हुआ था। धमाकों की वजह से ट्रेन में आग लग गई थी और इसमें महिलाओं और बच्चों समेत कुल 68 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 12 लोग घायल हो गए थे।

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19 फरवरी को जीआरपी/एसआईटी हरियाणा पुलिस ने मामले में केस दर्ज किया था और करीब ढाई साल बाद इस घटना की जांच की जिम्मेदारी 29 जुलाई 2010 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपी गई थी। बाद में इस घटना को अंजाम देने का सिलसिलेवार ब्योरा सामने आया था।
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धमाके के बाद मिले थे दो बम
केस से जुड़े वकीलों ने बताया कि जांच में यह स्थापित हुआ था कि समझौता एक्सप्रेस 18 फरवरी 2017 को रात 10 बजकर 50 मिनट पर दिल्ली से अपने गंतव्य अटारी (पंजाब) के लिए रवाना हुई थी। रात 11 बजकर 53 मिनट पर पानीपत के पास दिवाना स्टेशन से गुजरते हुए इसके दो जनरल डिब्बों (जीएस-03431 और जीएस-14857) में दो बम धमाके हुए थे। धमाके के बाद इसी ट्रेन के अन्य डिब्बे से बम से लैस दो सूटकेस बरामद हुए थे। इनमें से एक को डिफ्यूज कर दिया गया जबकि दूसरे को नष्ट किया गया।

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सूटकेस से आरोपियों तक पहुंची थी एनआईए

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समझौता एक्सप्रेस - फोटो : File Photo

शुरुआती जांच में यह पता चला था कि ये सूटकेस मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित कोठारी मार्केट में अभिनंदन बैग सेंटर के बने थे। जिसे अभियुक्त ने 14 फरवरी 2007 को खरीदा था। यानी हमले से ठीक चार दिन पहले। एनआईए की जांच में यह भी पता चला कि जिन लोगों ने हमला किया वो देश के विभिन्न मंदिरों पर हुए चरमपंथी हमलों से भड़के हुए थे।

इनमें गुजरात के अक्षरधाम मंदिर (24.09.2002) और जम्मू के रघुनाथ मंदिर में हुए दोहरे धमाके (30 मार्च और 24 नवंबर 2002) और वाराणसी के संकटमोचन मंदिर (07 मार्च 2006) शामिल हैं।

आरोप था कि इन्होंने वारदात को दिया था अंजाम
जांच के दौरान यह भी पाया गया कि नब कुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी उर्फ मनोज उर्फ गुरु जी, रामचंद्र कलसांगरा उर्फ रामजी उर्फ विष्णु पटेल, संदीप दांगे उर्फ टीचर, लोकेश शर्मा उर्फ अजय उर्फ कालू, कमल चौहान, रमेश वेंकट महालकर उर्फ अमित हकला उर्फ प्रिंस ने अन्य लोगों के साथ मिलकर इस हमले को अंजाम दिया था।

 एनआईए के पंचकूला स्थित स्पेशल कोर्ट में उपरोक्त अभियुक्तों को लेकर 2011 से 2012 के बीच तीन बार चार्जशीट फाइल की गई। इंदौर, देवास (मध्य प्रदेश), गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, जम्मू, उत्तराखंड और झारखंड के कुछ शहरों में आगे और भी विस्तार से जांच की गई। पूरे देश में बड़ी संख्या में लोगों से पूछताछ की गई।

जांच में यह स्थापित किया गया

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समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामला - फोटो : फाइल फोटो

जांच अधिकारियों के मुताबिक अभियुक्त बम धमाके करने के उद्देश्य से योजना बनाने को लेकर देश के विभिन्न शहरों में एक-दूसरे से मिले थे। इन लोगों ने बम बनाने से लेकर मध्य प्रदेश और फरीदाबाद के कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में पिस्तौल चलाने तक की ट्रेनिंग ली थी। 15 दिसंबर 2012 को इस मामले में आरोपी राजिंदर चौधरी नामक शख्स को इंदौर से गिरफ्तार किया गया था। 

राजिंदर चौधरी के साथ ही कमल चौहान और लोकेश शर्मा का नाम भी 2006 में हुए मालेगांव ब्लास्ट में सामने आया था। यह भी सामने आया कि राजिंदर ने इन सभी अभियुक्तों के साथ जनवरी 2006 में मध्य प्रदेश के देवास में बम विस्फोट और पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग ली थी। इसके बाद राजिंदर चौधरी और कमल चौहान ने दिसंबर 2006 के आसपास पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की रेकी की। 

दोनों इंदौर इंटरसिटी एक्सप्रेस से फर्जी नाम के साथ दिल्ली पहुंचे और वहां मौजूद सुरक्षा बंदोबस्त का जायजा लेकर उसी दिन वापस लौट गए थे। इसके बाद उन्होंने रिपोर्ट थी कि वहां सुरक्षा चाकचौबंद है, लिहाजा दो और मौके पर जनवरी-फरवरी 2007 में स्टेशन की रेकी फिर से की गई।

ब्लास्ट के दिन क्या हुआ था?
जांच में पता चला था कि लोकेश शर्मा, राजिंदर चौधरी 17 फरवरी (समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट से एक दिन पहले) को इंदौर में रमेश उर्फ अमित हकला के कमरे पर पहुंचे थे। जहां उनके साथ अन्य अभियुक्त कमल चौहान, रामचंद्र कलसांगरा शामिल हुए। इसके बाद रामचंद्र कलसांगरा ने लोकेश शर्मा, अमित हकला, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी को फर्जी नामों वाली दो टिकटें और आईईडी से भरा एक-एक बैग सौंपा था। जिसे बाद में समझौता एक्सप्रेस में रखा गया था। 

जिस कमरे में यह बैग इन चारों अभियुक्तों को सौंपा गया था, उसे रामचंद्र कलसांगरा ने किराये पर ले रखा था और उसमें अमित हकला 2006-07 से रहता था। यही वो कमरा था जिसमें इस ब्लास्ट में इस्तेमाल किए गए ज्वलनशील पदार्थों को बोतल में सील करने का काम भी अमित हकला और कमल चौहान ने किया था। 

इन चारों अभियुक्तों को रामचंद्र कलसांगरा ने ही अपनी मारुति वैन में इंदौर स्टेशन छोड़ा था। इंदौर से चलकर चारों अभियुक्त 18 फरवरी की सुबह निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचे थे और फिर वहां से लोकल ट्रेन के जरिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। 

पुरानी दिल्ली के डोरमेट्री में ठहरे थे आरोपी
आरोप था कि ये चारों अभियुक्त पुरानी दिल्ली के डोरमेट्री के दो अलग-अलग कमरों में ठहरे थे। कुछ देर यहां आराम करने के बाद ये सभी सूटकेस को वहीं छोड़कर बाहर भी गए थे। शाम को जब ये डोरमेट्री में वापस लौटे तो रमेश वेंकट महालकर (अमित हकला) ने राजिंदर चौधरी से दरवाजे पर नजर रखने को कहा ताकि बम के टाइमर को सेट किया जा सके। दूसरी तरफ लोकेश शर्मा ने भी दोनों सूटकेस में टाइमर लगाने की कोशिश की, लेकिन वहां लोगों की उपस्थिति की वजह से वो उसे एक्टिवेट नहीं कर सके। 

उसने इसकी जानकारी अमित हकला को दी। फिर दोनों ने डोरमेट्री की सीढ़ियों पर अपने सूटकेस आपस में बदल लिए। लोकेश शर्मा और कमल चौधरी सूटकेसों के साथ प्लेटफॉर्म पर चले गए और समझौता एक्सप्रेस के स्टेशन पर लगाए जाने का इंतजार करने लगे। उधर, अमित हकला ने सीढ़ियों पर बदले गए दोनों सूटकेसों में रखे बम के टाइमर को सेट किया और फिर राजिंदर चौधरी के साथ वो भी उस स्टेशन पर चले गए, जहां समझौता एक्सप्रेस को लगाया जाना था।

समझौता एक्सप्रेस पहले प्लेटफॉर्म के कोने (तब 18 नंबर प्लेटफॉर्म) पर लगाई गई। अमित हकला और राजिंदर चौधरी उस पर चढ़ गए। इसके बाद समझौता एक्सप्रेस तय समय के मुताबिक अपने गंतव्य अटारी की ओर चल पड़ी और फिर रास्ते में पानीपत के पास यह धमाका हुआ।

शिमला समझौते की देन है समझौता एक्सप्रेस
भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता एक्सप्रेस ट्रेन की शुरुआत शिमला समझौते के बाद 22 जुलाई 1976 को हुई थी। तब यह ट्रेन अमृतसर और लाहौर के बीच 52 किलोमीटर का सफर रोजाना किया करती थी। पंजाब में 1980 के दशक में फैली अशांति को लेकर सुरक्षा की वजहों से भारतीय रेल ने इस सेवा को अटारी स्टेशन तक सीमित कर दिया। जहां कस्टम और इमिग्रेशन की मंजूरी ली जाती है। जब यह सेवा शुरू हुई थी तब दोनों देशों के बीच ट्रेन रोजाना चला करती थी, जिसे 1994 में सप्ताह में दो बार में तब्दील कर दिया गया था।

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