श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व: बेमिसाल है गुरु जी का बलिदान... हर कश्मीरी हिंदू के दिल में उनका सम्मान
हम, कश्मीरी हिंदुओं का 5000 साल पहले का लिखित और दर्ज इतिहास है। कश्मीर सदियों से भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है।
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हिंद की चादर के रूप में जाने जाने वाले सिख धर्म के महान गुरु श्री तेग बहादुर जी के 400वें प्रकाश पर्व का जश्न हर कश्मीरी हिंदू के लिए भी फख्र का विषय है। हमारे अस्तित्व को बचाने के लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया। असल में कट्टर मुगल शासक औरंगजेब पूरे उपमहाद्वीप को इस्लाम में परिवर्तित करना चाहता था। उसके लिए कश्मीरी हिंदू सबसे आसान निशाना थे।
उन्हें चार सौ वर्षों तक उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार होना पड़ा। औरंगजेब के गवर्नर इफितखार खान ने कश्मीरी हिंदुओं पर आतंक मचा दिया। मुगलों के कहर से बचने के लिए कश्मीरी हिंदुओं ने श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा में प्रार्थना की। माना जाता है कि वहीं एक हिंदू को सपना आया कि श्री आनंदपुर साहिब पहुंचो और सिखों के नवें श्री गुरु तेग बहादुर जी से मदद मांगो। इसके बाद पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में कश्मीरी हिंदुओं का समूह श्री आनंदपुर साहिब पहुंचा।
सभी ने गुरु श्री तेग बहादुर जी से मदद की गुहार लगाई। गुरु जी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए किसी महान शख्स को अपना बलिदान देना होगा। पास ही खड़े उनके पुत्र बाल गोबिंद राय बोल उठे-आपसे बड़ा कौन होगा पिताजी। गुरु जी अपने 14 वर्षीय बेटे की बात सुनकर चिंता मुक्त हो गए और दिल्ली पहुंच गए। यहां उन्होंने औरंगजेब को तर्क करने के लिए ललकारा। कहा- कि यदि उन्होंने (गुरु जी) इस्लाम अपना लिया तो सभी हिंदू इस्लाम धर्म को अपना लेंगे। औरंगजेब ने खूब कहर बरपाया लेकिन गुरु जी को झुका नहीं पाया। आखिरकार धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने अपना शीश बलिदान कर दिया। उसी जगह पर आज गुरुद्वारा शीश गंज साहिब स्थित है।
जब मैं गुरु के बलिदान को याद करता हूं तो यह हमारी वर्तमान दुर्दशा के बारे में भी बताता है। हमें फिर से उन्हीं उग्रवादियों और कट्टरपंथियों ने अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया, जिन्होंने सैकड़ों साल पहले हमारे पूर्वजों को बदलने की कोशिश की थी। 32 साल पहले मुझे अपने माता-पिता के साथ कश्मीर घाटी को छोड़ना पड़ा।
हम, कश्मीरी हिंदुओं का 5000 साल पहले का लिखित और दर्ज इतिहास है। कश्मीर सदियों से भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है। कट्टरपंथियों द्वारा नष्ट कर दिए गए महान मंदिरों के खंडहर हमारे इतिहास और संस्कृति के साक्षी हैं। कश्मीर के हर गांव और हर कस्बे का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। मेरा जन्म स्थान, सुंबल इंद्रकोट, कश्मीर के अंतिम हिंदू शासक, कोटा रानी की सत्ता की सीट थी, जिसे उसके एक मुस्लिम सलाहकार शाह मीर ने धोखा दिया।
कश्मीर में इस्लामी शासन की शुरुआत 1320 के आसपास हुई थी। इसके बाद के पांच सौ साल कश्मीरी हिंदुओं के लिए यातना और उत्पीड़न के वर्ष थे। श्री गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद, महाराजा रणजीत सिंह कश्मीरी हिंदुओं के महान रक्षक थे। उस समय कश्मीर पर क्रूर अफगानों का शासन था। देश को आजादी मिलने के बाद चीजें बदल गईं।
1947 के बाद से, कश्मीरी हिंदुओं को सूक्ष्म उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। 1951 में कश्मीर में भूमि सुधार शुरू किए गए थे। चूंकि अधिकांश जमींदार कश्मीरी हिंदू थे, इसलिए जमीन की सीलिंग लगाई गई और बिना किसी मुआवजे के जमीन का काफी हिस्सा छीन लिया गया। धीरे-धीरे उग्रवाद चरम पर पहुंच गया। 1989 में कश्मीरी हिंदुओं को अपने घर और चूल्हे छोड़ने पड़े।
19 जनवरी 1990 कश्मीरी हिंदुओं के लिए खौफ की रात थी। मस्जिदों से घोषणाएं की गई कि गैर-मुसलमान कश्मीर छोड़ दें। मुझे अभी भी वे नारे याद हैं, ‘ऐ काफिरो ऐ जबीरो, कश्मीर हमारा छोड दो...’ सैकड़ों कश्मीरी हिंदुओं की हत्याएं हुईं। यह सच है कि मुसलमानों को भी मारा गया लेकिन केवल उन्हें जिन पर पुलिस का मुखबिर होने या कांग्रेस व नेशनल कांफ्रेंस जैसे राजनीतिक दलों से संबंध का संदेह था।
1990 के मध्य तक लगभग हर कश्मीरी हिंदू ने घाटी छोड़ दी। ठंडे मौसम में रहने वाले कश्मीरी हिंदुओं को जम्मू और दिल्ली जैसे मैदानी इलाकों में गर्म और प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ा, जहां सैकड़ों लोग हीट स्ट्रोक के कारण मारे गए। जम्मू के शिविरों में सर्पदंश से कई लोगों की मौत हो गई। यह एक अभूतपूर्व त्रासदी थी, जो ऐसे समुदाय पर बरपी जिसकी अपराध दर शून्य प्रतिशत है और जो शत-प्रतिशत साक्षर है।
अब हमारे अपने देश में निर्वासन के 32 साल हो गए हैं। आम तौर पर देशवासियों और विशेष रूप से केंद्र की सरकारों के समर्थन के लिए धन्यवाद, चाहे भाजपा हो या कांग्रेस और उनके सहयोगी, हर सरकार ने समर्थन किया है। अधिकांश कश्मीरी हिंदुओं ने कड़ी मेहनत और शिक्षा के कारण मुकाम हासिल किए हैं। वे देश और विदेश में जाकर बस गए हैं। लेकिन अपनी जड़ों की ओर लौटने की लालसा आज भी उनके मन में है।
- नोट: विमल सुंबली एक वरिष्ठ लेखक व कश्मीरी पंडित हैं, जो पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के मीडिया सचिव रहे हैं।