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Shradh Paksha 2020: दिवंगत पितरों का आशीर्वाद चाहिए तो इस जीवित 'बागवां' का रखिए ख्याल
Wed, 02 Sep 2020 09:41 AM IST
खुशबू गोयल
देव शर्मा, करनाल
देव शर्मा, करनाल
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 02 Sep 2020 09:41 AM IST
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अपना आशियाना
- फोटो : फाइल फोटो
श्राद्ध चल रहे हैं और अगर आपको अपने दिवंगत पितरों का आशीर्वाद चाहिए तो अपनों को मान सम्मान दीजिए व उनका ख्याल रखिए। पितृपक्ष में पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए तमाम जतन किये जाते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो जीते जी अपनों को असहाय और बेसहारा छोड़ देते हैं। सब कुछ होते हुए भी वे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं। सही मायने में इन अपनों की सेवा में ही मोक्ष और मुक्ति का मार्ग छिपा है।
करनाल में इसे साकार कर रहा है अपना आशियाना, जहां इस तरह के असहाय और जरूरतमंदों को ना सिर्फ शरण दी जा रही है, बल्कि उन्हें हर संभव सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। पितृ पक्ष बुधवार से शुरू हो रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ अमावस्या को धरती पर आने वाले पितरों को विदाई दी जाती है। यह पूरा पखवाड़ा देहावसान कर चुके पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का है, यह भी कहा जाता है कि अमावस्या को गरीबों को भोजन कराने, दान पुण्य करने से पितरों को शांति मिलती है।
लेकिन इससे इतर ऐसे भी कई बांगवा हैं, जिन्हें जीवित रहते हुए अपनों ने ठुकरा दिया है। वह भूख प्यास से तड़पते हुए जख्मी हालत में दर दर भटक रहे हैं, ना रहने को छत है और खाने की कोई व्यवस्था। कोई बीमारी से तड़प रहा है तो कोई अंगों में कीड़े पड़ जाने से बिलबिला रहा है, लेकिन साधन संपन्न परिवार होने के बावजूद उनकी कोई सुधि लेने वाला नहीं है। दिवंगत हो चुके पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करने वाले परिजनों के लिए यह मिसाल है कि यदि जीवित रहते ही उनके दुख दर्द का ख्याल रखा जाए।
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करनाल के अपना आशियाना में इन दिनों 93 बेसहारा, लाचार लोग एक परिवार की तरह रहते हैं। यहां उनकी अलग दुनिया है। किसी के सिर में कीड़े पड़े थे तो किसी के पैर में, लेकिन अब हर दिन उन्हें स्नान आदि कराकर नियमित मरहम पट्टी, समय पर दवाइयां, भोजन, नाश्ता, धुले हुए कपड़े, स्वच्छ बिस्तर आदि मिल रहे हैं। वहीं परिजनों ने उन्हें जीवित होते हुए भी मृत मानकर सारे रिश्ते नाते तोड़ लिए हैं।
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करनाल में इसे साकार कर रहा है अपना आशियाना, जहां इस तरह के असहाय और जरूरतमंदों को ना सिर्फ शरण दी जा रही है, बल्कि उन्हें हर संभव सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। पितृ पक्ष बुधवार से शुरू हो रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ अमावस्या को धरती पर आने वाले पितरों को विदाई दी जाती है। यह पूरा पखवाड़ा देहावसान कर चुके पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का है, यह भी कहा जाता है कि अमावस्या को गरीबों को भोजन कराने, दान पुण्य करने से पितरों को शांति मिलती है।
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लेकिन इससे इतर ऐसे भी कई बांगवा हैं, जिन्हें जीवित रहते हुए अपनों ने ठुकरा दिया है। वह भूख प्यास से तड़पते हुए जख्मी हालत में दर दर भटक रहे हैं, ना रहने को छत है और खाने की कोई व्यवस्था। कोई बीमारी से तड़प रहा है तो कोई अंगों में कीड़े पड़ जाने से बिलबिला रहा है, लेकिन साधन संपन्न परिवार होने के बावजूद उनकी कोई सुधि लेने वाला नहीं है। दिवंगत हो चुके पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करने वाले परिजनों के लिए यह मिसाल है कि यदि जीवित रहते ही उनके दुख दर्द का ख्याल रखा जाए।
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करनाल के अपना आशियाना में इन दिनों 93 बेसहारा, लाचार लोग एक परिवार की तरह रहते हैं। यहां उनकी अलग दुनिया है। किसी के सिर में कीड़े पड़े थे तो किसी के पैर में, लेकिन अब हर दिन उन्हें स्नान आदि कराकर नियमित मरहम पट्टी, समय पर दवाइयां, भोजन, नाश्ता, धुले हुए कपड़े, स्वच्छ बिस्तर आदि मिल रहे हैं। वहीं परिजनों ने उन्हें जीवित होते हुए भी मृत मानकर सारे रिश्ते नाते तोड़ लिए हैं।
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बेसहारा हुए लोगों की कहानी, उन्हीं की जुबानी
55 वर्षीय राजेश्वर बताते हैं कि उनका भरा पूरा परिवार है, लेकिन उन्हें पैरालाइसिस होने के बाद परिजनों ने किनारा कर लिया। भाई उसे अपना आशियाना में छोड़ गया है। इसके बाद कभी लौटकर देखने नहीं आया है। 70 वर्षीय कृष्णा, जिन्हें यहां सभी मां जी कहकर बुलाते हैं, वह बोल नहीं पाती हैं लेकिन इशारों ही इशारों में अपनों द्वारा ठुकराए जाने का गम उनके चेहरे की झुर्रियों में साफ झलकता है।
60 वर्षीय शिवचरन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है, उसका एक बेटा और एक बेटी भी है, लेकिन उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद अपना आशियाना को लोगों ने फोन किया तो यहां आ गया। तब से परिजनों ने जो झांककर नहीं देखा लेकिन यहां उन्हें अब अपनों की कमी महसूस नहीं हो रही है।
40 वर्षीय अर्जुन को उसके मंदबुद्धि होने की सजा मिल रही है, उसके भाई बहन भी हैं, लेकिन दिमाग ठीक नहीं होने के कारण परिजनों ने उसे सड़क पर लावारिस छोड़ दिया था। भूखा प्यासा भटकता रहा लेकिन अब अपना आशियाना पहुंचने पर उसका उपचार भी हो रहा है, भोजन भी मिल रहा है।
27 वर्षीय दिशू जो उत्तराखंड से यहां लाया गया है भी मंदबुद्धि है, उसके माता पिता की मृत्यु हो गई, इकलौती बहन की शादी हो गई, तो उसके ससुराल वालों ने उसे अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। विवश होकर उसकी बहन ही यहां छोड़ गई। हर रक्षा बंधन पर उसे राखी बांधने यहां आती है।
अपना आशियाना के मुख्य संचालक चरनजीत बाली व उनके सहयोगी राज कुमार, जगमेर पाल, अनु मदान, अंशू ग्रोवर आदि का कहना है कि 1993 में जब सनातन धर्म मंदिर के बाहर एक लावारिस व्यक्ति आया, जिसके पैर में कीड़े पड़े थे। तब उसे चरनजीत बाली ने कई संस्थाओं को देने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। तब उन्होंने अपना आशियाना बनाने का सपना संजोया। लोग जुड़े और लावारिसों को ठिकाना मिल गया। पहले किराये के भवन में था, चार साल पहले 2000 वर्ग गज जगह लेकर आशियाना बना दिया गया।
60 वर्षीय शिवचरन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है, उसका एक बेटा और एक बेटी भी है, लेकिन उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद अपना आशियाना को लोगों ने फोन किया तो यहां आ गया। तब से परिजनों ने जो झांककर नहीं देखा लेकिन यहां उन्हें अब अपनों की कमी महसूस नहीं हो रही है।
40 वर्षीय अर्जुन को उसके मंदबुद्धि होने की सजा मिल रही है, उसके भाई बहन भी हैं, लेकिन दिमाग ठीक नहीं होने के कारण परिजनों ने उसे सड़क पर लावारिस छोड़ दिया था। भूखा प्यासा भटकता रहा लेकिन अब अपना आशियाना पहुंचने पर उसका उपचार भी हो रहा है, भोजन भी मिल रहा है।
27 वर्षीय दिशू जो उत्तराखंड से यहां लाया गया है भी मंदबुद्धि है, उसके माता पिता की मृत्यु हो गई, इकलौती बहन की शादी हो गई, तो उसके ससुराल वालों ने उसे अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। विवश होकर उसकी बहन ही यहां छोड़ गई। हर रक्षा बंधन पर उसे राखी बांधने यहां आती है।
अपना आशियाना के मुख्य संचालक चरनजीत बाली व उनके सहयोगी राज कुमार, जगमेर पाल, अनु मदान, अंशू ग्रोवर आदि का कहना है कि 1993 में जब सनातन धर्म मंदिर के बाहर एक लावारिस व्यक्ति आया, जिसके पैर में कीड़े पड़े थे। तब उसे चरनजीत बाली ने कई संस्थाओं को देने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। तब उन्होंने अपना आशियाना बनाने का सपना संजोया। लोग जुड़े और लावारिसों को ठिकाना मिल गया। पहले किराये के भवन में था, चार साल पहले 2000 वर्ग गज जगह लेकर आशियाना बना दिया गया।