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भगत सिंह ने जेल में देश के नाम लिखी थी आखिरी चिट्ठी, आप भी पढ़िए संदेश

Fri, 24 Mar 2017 09:23 AM IST
amarujala.com- Written by: खुशबू गोयल
amarujala.com- Written by: खुशबू गोयल Updated Fri, 24 Mar 2017 09:23 AM IST
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shaheed diwas, last letter and message of bhagat singh, Sukhdev Thapar, Shivaram Rajguru
भगत सिंह शहीदी दिवस
भगत सिंह 23 मार्च 1931 की उस शाम का लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। अपने आखिरी खत में भी उन्होंने इसका जिक्र किया था। भगत सिंह ने खत में लिखा, ‘साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैंद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए’।
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सालों बीत गए, लेकिन उनकी कुर्बानी देश की हिम्मत है

shaheed diwas, last letter and message of bhagat singh, Sukhdev Thapar, Shivaram Rajguru
भगत सिंह शहीदी दिवस
भगत सिंह कहते थे, 1931 से 1947 के बीच आजादी के 125 से भी ज्यादा दीवाने फांसी के फंदे पर झूल गए और उन नौजवानों के लिए भरत सिंह की कुर्बानी एक मिसाल बनकर सामने आई। साल बीत गए, लेकिन कुर्बानी की वो कहानी आज भी इस मुल्क की हिम्मत है, सलाम है शहीद-ए-आजम भगत सिंह को, जिन्होंने सबकुछ लुटाकर, हिन्दुस्तान को सबकुछ दिला दिया।

भगत सिंह को जिस दिन फांसी दी जानी थी उस रोज भी वो मुस्कुरा रहे थे। उनके चेहरे पर शिकन पर कोई निशान नहीं था, लेकिन लाहौर की उस जेल में हर कैदी की आंखें नम थीं। फांसी की कार्रवाई शुरू होने से पहले भगत सिंह ने अपनी ऊंची आवाज में देश को एक छोटा सा संदेश भी दिया। भगत सिंह ने कहा कि आप नारा लगाते हैं, इंकलाब जिंदाबाद, मैं ये मानकर चल रहा हूं कि आप वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं।

अब आप सिर्फ अपने बारे में सोचना बंद करें, व्यक्तिगत आराम के सपने को छोड़ दें, हमें इंच-इंच आगे बढ़ना होगा। इसके लिए साहस, दृढ़ता और मजबूत संकल्प चाहिए। कोई भी मुश्किल आपको रास्ते से डिगाए नहीं। किसी विश्वासघात से दिल न टूटे। पीड़ा और बलिदान से गुजरकर आपको विजय प्राप्त होगी। ये व्यक्तिगत जीत क्रांति की बहुमूल्य संपदा बनेंगी।
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