खतरनाक कीट की दस्तक, काटने के बाद अंग हो जाते बंद, रोहतक में दो की हो चुकी मौत, जानें लक्षण
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डेंगू के सीजन में स्क्रब टायफस को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। इस सीजन में अब तक जिले में करीब 28 मरीज वायरस के सामने आ चुके हैं और दो की उपचार के दौरान मौत भी हो चुकी है। हाल में दो मरीज पीजीआईएमएस के आपात विभाग में उपचाराधीन हैं और इनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। इसके अलावा कुछ मरीज संस्थान के विभिन्न वार्डों में भी उपचार पा रहे हैं।
एक्सपर्ट बताते हैं कि यह बीमारी मुख्य रूप से जंगल, हरियाली, बाग में मिलने वाले कीट व जानवरों में मिलने वाले कीटों से होती है। स्थिति यह होती है कि सामान्य डॉक्टर डेंगू, मलेरिया आदि रोगियों के लक्षणों में व स्क्रब टायफस के शिकार मरीजों के लक्षणों में अंतर नहीं कर पाते। अगस्त से नवंबर माह के बीच इस बीमारी का अधिक खतरा होता है।
इस बीमारी में समस्या यह है कि डेंगू और वायरल बुखार के कुछ लक्षण इसमें एक समान होते हैं। इसलिए जरूरी है कि समस्या होने पर काबिल चिकित्सक से अपनी जांच कराएं और बीमारी की पहचान होने के बाद सही उपचार लें। पीजीआईएमएस में पीसीसीएम विभागाध्यक्ष डॉ. ध्रुव चौधरी बताते हैं कि 2007-08 में इस बीमारी की प्रदेश में पहली बार पहचान हुई थी। स्थिति यह थी कि 2013 तक इस बीमारी को कोई मानने को ही तैयार नहीं था। लेकिन संस्थान में 20 मरीजों की पुष्टि हुई थी और तीन मरीज की उपचार के दौरान मौत हुई थी।
स्क्रब टायफस वायरस मल्टी आर्गन को कर सकता है फेल
डॉ. ध्रुव चौधरी ने बताया कि स्क्रब टायफस से संक्रमित व्यक्ति पर सात से आठ दिन में असर आता है। इसमें मरीज को डोक्सीसाइकलिन दी जाती है। इसकी जांच के लिए कार्ड टेस्ट व एलाइजा टेस्ट होता है। यह जांच पीजीआईएमएस की माइक्रोबायोलॉजी विभाग में होती है।
यह कीट अकसर गर्म व नमी वाली जगह में काटता है। यदि इसका उपचार समय पर न हो तो मरीज को मल्टी आर्गन फेलियोर हो सकता है। इससे मरीज का जीवन खतरे में आ जाता है। समस्या यह है कि इसका वायरस रक्त वाहिकाओं में फैल कर शरीर के मुख्य अंगों की नसों को ब्लाक कर देता है और वह अंग काम करना बंद कर देता है।
पहचान
पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाने वाली बीमारी को प्रदेश में नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसके प्रभाव में आने वाले शरीर में काटे गए स्थान पर अलसर बनता है और यह काले रंग का हो जाता है। पहले यह बीमारी जंगलों में रहने वालों व पर्वतारोहियों को होता था। अब यह मैदानी इलाकों में रहने वालों को भी प्रभावित कर रहा है।
लक्षण व प्रभाव
- बुखार के कारण का पता न चलना
- 103 से 104 डिग्री बुखार रहना
- सिर दर्द, चमड़ी पर चकते बनना, प्लेटलेट्स का गिरना
- दिमाग, दिल, फेफड़ा, गुर्दे पर प्रभाव आना
सुझाव
- प्लेटलेट्स गिरने के कई कारण होते हैं, घबराने की जगह जांच कराएं
- झोलाछाप डॉक्टरों से बचें और झाड़ फूंक के चक्कर में न फंसें
- खेतों में बगैर जूतें व ग्लब्ज के न जाएं