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सहकारिता विभाग में घोटाला : तीनों अफसरों की बर्खास्तगी पर लगी सीएम की मुहर

Wed, 14 Feb 2024 09:06 PM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 14 Feb 2024 09:06 PM IST
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Scam in Cooperative Department: CM approves dismissal of three officers.
मंत्री डाॅ. बनवारी लाल के कार्यालय पहुंची फाइल, आज जारी हो सकते हैं आर्डर
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सात महीने से विभाग में अटकी बर्खास्तगी की फाइल घोटाला खुलते ही चार दिन में सीएम के पास पहुंची
चंडीगढ़। हरियाणा सहकारिता विभाग में हुए करोड़ों रुपये के घोटाले के मुख्य आरोपी तीन अफसरों की बर्खास्तगी पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री की मुहर लगने के बाद इस फाइल को वापस सहकारिता विभाग के मंत्री डाॅ. बनवारी लाल के पास भेज दिया है। संभावना है कि वीरवार को यह फाइल विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पास पहुंच जाएगी और तीनों अफसरों के बर्खास्तगी के आदेश जारी किए जाएंगे।
छह फरवरी को सहकारिता मंत्री डाॅ. बनवारी लाल ने मुख्यमंत्री के साथ बैठक की थी और इसी दिन तीनों अफसरों की बर्खास्तगी की फाइल मुख्यमंत्री के पास पहुंची थी। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय के अफसरों ने इस पर कानूनी और तकनीकी बातों का अध्ययन किया। इसके बाद सीएम मनोहर लाल ने घोटाले की आरोपी सहायक रजिस्ट्रार अनु कौशिश, सहायक रजिस्ट्रार रामकुमार और डिप्टी चीफ ऑडिटर योगेंद्र अग्रवाल को सेवा से बर्खास्त करने की मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री ने कड़ी चेतावनी दी है कि भ्रष्टाचार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कितना ही बड़ा अधिकारी हो।
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पहले सात माह तक अटकी रही थी फाइल
इससे पहले, सात माह तक इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की फाइल उच्च अधिकारियों के पास पड़ी रही। मई, 2023 में एसीबी गुरुग्राम ने रेवाड़ी सहकारिता विभाग में घोटाला पकड़ा था। इस मामले के आरोपी एआर अनु कौशिश और डिप्टी चीफ ऑडिटर योगेंद्र अग्रवाल को बर्खास्त करने के लिए रजिस्ट्रार राजेश जोगपाल ने सात जुलाई, 2023 को सिफारिश भेजी थी। लेकिन उच्चाधिकारियों ने ऐसा न करके इनको चार्जशीट करने के लिए कहा। इसके बाद फिर फाइल भेजी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
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एसीबी का दावा 100 करोड़ रुपये का घोटाला
एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने परत दर परत जांच करके दावा किया यह करीब 100 करोड़ रुपये का घोटाला है। इस मामले में अलग-अलग 12 एफआईआर दर्ज हैं। उधर, हरियाणा सरकार ने फैसला लिया कि इस मामले की जांच 1995 से लेकर अब तक की जाएगी। साथ ही बाहरी एजेंसी से विभाग का ऑडिट भी कराया जाएगा।
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