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बेमिसालः हजारों प्रवासी घर पहुंचाए, दस दिन तक बेटी से भी नहीं मिली थीं कोरोना योद्धा सुखपिंदर
Tue, 22 Sep 2020 03:02 PM IST
खुशबू गोयल
नगमा सिंह, मोहाली
नगमा सिंह, मोहाली
Published by: खुशबू गोयल
Updated Tue, 22 Sep 2020 03:02 PM IST
सार
- बेहतरीन सेवाएं देने वाली रेवेन्यू तहसीलदार सुखपिंदर कौर ने शेयर किए तुजुर्बे
- बेटी और मां बनी ताकत, तभी अपनी जिम्मेदारी बढ़िया तरीके से पूरी कर पाईं
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सुखपिंदर कौर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद कोविड काल में जिस तरह जरूरतमंद लोगों की मदद करके उनके चेहरों पर मुस्कान लाने में लगे हुए हैं। उनसे प्रेरित होकर उन्हीं की तरह मोहाली में तैनात रेवेन्यू तहसीलदार सुखपिंदर कौर भी एक कोरोना वॉरियर की तरह काम कर रही हैं। जी हां, सुखपिंदर कौर ने इतना ही नहीं कोविड काल के शुरूआती दौर में जब प्रवासी लोगों को घर भेजने की प्रक्रिया शुरू हुई तो वह करीब 10 दिन तक अपनी इकलौती बेटी से मिल तक नहीं पाई थीं।
हालांकि इस दौरान उनकी बेटी ने इसकी कोई शिकायत नहीं की। इस पर बातचीत में सुखपिंदर कौर ने बताया कि उस दौरान मेरी बेटी ने मुझसे शिकायत नहीं कि बल्कि मेरी बेटी और मां मेरी ताकत बनी। जिससे मैं ड्यूटी के दौरान अपनी जिम्मेदारियों को बढ़िया तरीके से निभा पाई। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान पब्लिक डीलिंग बंद कर दी गई थी। ऐसे में उन्हें लोगों की समस्याओं को सुलझाने का जिम्मा भी दिया गया।
इस दौरान जब कामधंधे और बाजार बंद हो गए तो जरूरतमंद लोगों को खाने-पीने की चीजें नहीं मिल पा रहीं थीं। इस पर किसी भी तरह की मदद मांगने के लिए अफसरों के फोन नंबर आम जनता तक पहुचाएं गए। जिन पर जरूरतमंद लोगों ने भोजन, राशन और सेहत सेवा पहुंचाने के लिए फोन करके मदद मांगी तो यह जिम्मेदारी भी मुझे सौंपी गई।
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2018 से डीसी ऑफिस में कार्यरत
बता दें कि आतंकवाद के दौरान आतंकवादियों से पीड़ित परिवार से संबंध रखने वाली सुखपिंदर कौर ने 1996 में नायब तहसीलदार के तौर पर काम सभाला था। एक साधारण जीवन जीने वाली सुखपिंदर कौर 2018 से मोहाली के डीसी ऑफिस में रेवेन्यू तहसीलदार के तौर पर तैनात हैं।
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हालांकि इस दौरान उनकी बेटी ने इसकी कोई शिकायत नहीं की। इस पर बातचीत में सुखपिंदर कौर ने बताया कि उस दौरान मेरी बेटी ने मुझसे शिकायत नहीं कि बल्कि मेरी बेटी और मां मेरी ताकत बनी। जिससे मैं ड्यूटी के दौरान अपनी जिम्मेदारियों को बढ़िया तरीके से निभा पाई। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान पब्लिक डीलिंग बंद कर दी गई थी। ऐसे में उन्हें लोगों की समस्याओं को सुलझाने का जिम्मा भी दिया गया।
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इस दौरान जब कामधंधे और बाजार बंद हो गए तो जरूरतमंद लोगों को खाने-पीने की चीजें नहीं मिल पा रहीं थीं। इस पर किसी भी तरह की मदद मांगने के लिए अफसरों के फोन नंबर आम जनता तक पहुचाएं गए। जिन पर जरूरतमंद लोगों ने भोजन, राशन और सेहत सेवा पहुंचाने के लिए फोन करके मदद मांगी तो यह जिम्मेदारी भी मुझे सौंपी गई।
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2018 से डीसी ऑफिस में कार्यरत
बता दें कि आतंकवाद के दौरान आतंकवादियों से पीड़ित परिवार से संबंध रखने वाली सुखपिंदर कौर ने 1996 में नायब तहसीलदार के तौर पर काम सभाला था। एक साधारण जीवन जीने वाली सुखपिंदर कौर 2018 से मोहाली के डीसी ऑफिस में रेवेन्यू तहसीलदार के तौर पर तैनात हैं।
जरूरतमंदों के मदद मांगने पर मुहैया करवाया भोजन और राशन
सुखपिंदर कौर ने बताया कि उस दौरान मदद के लिए लोगों के लगातार फोन आ रहे थे और हमारा काम यहीं था कि जरूरतमंद लोगों तक हर मदद पहुंचाई जाए। कुछ ही दिनों में मदद के लिए जरूरतमंदों के हमें ज्यादा फोन आने लगे। इस पर गुरुद्वारों और अन्य समाज सेवी संस्थाओं की मदद से मैंने और मेरी टीम ने मिलकर जरूरतमंद लोगों तक भोजन मुहैया करवाया।
इस बीच हमें हिदायतें मिली थी कि अब से पका हुआ भोजन नहीं बांटा जाएगा, सूखा राशन भी दिया गया। इसके बाद काफी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने अपने-अपने घरों के लिए लौटना शुरू कर दिया था। ऐसे में रेलवे स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने का जिम्मा सौंपा गया। ऐसे में लोगों की कोरोना से सुरक्षा को देखते हुए हर एक व्यक्ति को सैनिटाइज करने से लेकर उन्हें मास्क और खाना मुहैया करवाने तक का काम सुबह 5 बजे से शाम के 7 बजे तक चलता रहता था।
उस दौरान हालात यह थे कि रोजाना हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को परिवार सहित सुरक्षित उनके घरों के लिए भेजा गया। ऐसा मंजर जिंदगी में पहली बार देखा गया था कि जहां लोग ऐसी महामारी की मुश्किल की घड़ी में भी छोटे-बड़े कामों को छोड़कर अपने गांव-शहर पहुंचना चाहते थे। सुखपिंदर कौर ने बताया कि सुबह 9 से शाम 5 बजे की जॉब के बाद यह पहला मौका था, जहां उन्हें लगातार काम करना पड़ा।
इस बीच हमें हिदायतें मिली थी कि अब से पका हुआ भोजन नहीं बांटा जाएगा, सूखा राशन भी दिया गया। इसके बाद काफी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने अपने-अपने घरों के लिए लौटना शुरू कर दिया था। ऐसे में रेलवे स्टेशन पर प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने का जिम्मा सौंपा गया। ऐसे में लोगों की कोरोना से सुरक्षा को देखते हुए हर एक व्यक्ति को सैनिटाइज करने से लेकर उन्हें मास्क और खाना मुहैया करवाने तक का काम सुबह 5 बजे से शाम के 7 बजे तक चलता रहता था।
उस दौरान हालात यह थे कि रोजाना हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को परिवार सहित सुरक्षित उनके घरों के लिए भेजा गया। ऐसा मंजर जिंदगी में पहली बार देखा गया था कि जहां लोग ऐसी महामारी की मुश्किल की घड़ी में भी छोटे-बड़े कामों को छोड़कर अपने गांव-शहर पहुंचना चाहते थे। सुखपिंदर कौर ने बताया कि सुबह 9 से शाम 5 बजे की जॉब के बाद यह पहला मौका था, जहां उन्हें लगातार काम करना पड़ा।