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सांग के शौकीन हैं तो पहुंचें टैगोर थियेटर, 8 दिवसीय उत्सव
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 16 Jun 2016 09:04 PM IST
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चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में सांग उत्सव
- फोटो : अमर उजाला
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अगर आप सांग देखने के शौकीन हैं तो 8 दिन अलग अलग सांग का मजा उठा सकते हैं। इसके लिए टैगौर थियेटर आना होगा। यहां पर सूचना जन संपर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा की ओर से आठ दिवसीय सांग उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। वीरवार को शुरू हुए इस उत्सव के पहले दिन धनपत सिंह की रचना और कुलदीप के निर्देशन में बणदेवी सांग को पेश किया गया।
कहानी में दिखाया गया कि एक राजा हेमरथ थे। उनके पुत्र का नाम कनकृत था। राजकुमार कनकृत की शादी रुक्मणि से तय हो जाती है। जब राजा हेमरथ अपने बेटे कनकृत की बारात लेकर जाते है तो रास्ते में एक साधु की लड़की बणदेवी से उनकी मुलकात होती है। राजा अपने पुत्र का विवाह बणदेवी से करव देता है और वापिस अपने राज्य लौट आता है। इस बात का जब रुक्मणि को पता चलता है तो वह अपनी दूत को बणदेवी केपास भेजती है।
बाद में राजा बणेदवी को महल से निकाल देता है और इदसके बाद वह साधवी बनकर जंगल मे रहने लग जाती है। इसके कुछ दिन बाद एक बार फिर से रुक्मणि की शादी का प्रस्ताव एक बार फिर से राजा हेमरथ के पास आता है। राजा अपने पुत्र की बारात लेकर निकल पड़ता है। रास्ते में एक साधु के रुप में बणदेवी से उनकी मुलाकात होती है। राजा उसे भी बारात का हिस्सा बना लेता है। वहीं कावेरी नगर पहुंचकर सारी कहानी का भेद खुल जाता है और अंत में कनकृत की शादी दोबारा से बणदेवी के साथ हो जाती है।
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कहानी में दिखाया गया कि एक राजा हेमरथ थे। उनके पुत्र का नाम कनकृत था। राजकुमार कनकृत की शादी रुक्मणि से तय हो जाती है। जब राजा हेमरथ अपने बेटे कनकृत की बारात लेकर जाते है तो रास्ते में एक साधु की लड़की बणदेवी से उनकी मुलकात होती है। राजा अपने पुत्र का विवाह बणदेवी से करव देता है और वापिस अपने राज्य लौट आता है। इस बात का जब रुक्मणि को पता चलता है तो वह अपनी दूत को बणदेवी केपास भेजती है।
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बाद में राजा बणेदवी को महल से निकाल देता है और इदसके बाद वह साधवी बनकर जंगल मे रहने लग जाती है। इसके कुछ दिन बाद एक बार फिर से रुक्मणि की शादी का प्रस्ताव एक बार फिर से राजा हेमरथ के पास आता है। राजा अपने पुत्र की बारात लेकर निकल पड़ता है। रास्ते में एक साधु के रुप में बणदेवी से उनकी मुलाकात होती है। राजा उसे भी बारात का हिस्सा बना लेता है। वहीं कावेरी नगर पहुंचकर सारी कहानी का भेद खुल जाता है और अंत में कनकृत की शादी दोबारा से बणदेवी के साथ हो जाती है।
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