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सीएफएसएल-पीयू की क्रांतिकारी खोज: ब्लड-यूरीन सैंपल से जहर की पहचान 40 मिनट में होगी...खर्च सिर्फ 25 रुपये
Mon, 09 Jun 2025 09:58 AM IST
निवेदिता वर्मा
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 09 Jun 2025 09:58 AM IST
सार
रोटेटिंग पेपर डिस्क डिवाइस बायोडिग्रेडेबल सेल्यूलोज पर आधारित है। आरपीडी एक डिस्पोजेबल एक बार इस्तेमाल होने वाला उपकरण है, जिससे न केवल कैरीओवर की संभावना खत्म होती है, बल्कि यह पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित बना देता है।
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आरपीडी डिवाइस
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
फोरेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (सीएफएसएल) चंडीगढ़ और पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) के वैज्ञानिकों ने एक कमाल की खोज की है।
एक ऐसा डिवाइस विकसित किया है, जो खून और पेशाब में जहर की पहचान अब पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक तरीके से कर सकेगा। रोटेटिंग पेपर डिस्क (आरपीडी) नामक इस तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है। न केवल यह डिवाइस जांच की रफ्तार बढ़ाएगा, बल्कि इसकी लागत भी बेहद कम है।
आरपीडी को सीएफएलएल चंडीगढ़ की निदेशक डॉ सुखमिंदर कौर के मार्गदर्शन में डॉ. राजीव जैन और पीयू की भारती जैन व अन्य ने मिलकर बनाया है। इस नई तकनीक के विकसित होने से पहले पारंपरिक लिक्विड लिक्विड एक्सट्रैक्शन (एलएलई) तकनीक से विभिन्न प्रकार के जैविक नमूनों (खून व यूरिन) से मादक पदार्थों और अन्य दवाओं की जांच होती थी।
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यह भी पढ़ें: चंडीगढ़ में दरिंदगी: महिला दोस्त पर रखता था बुरी नजर, अपहरण के बाद कपड़े उतार कर पीटा; फिर किया गंदा काम
एलएलई तकनीक में डीप्रोटीनाइजेशन, फेज सेपरेशन, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन, सेंट्रीफ्यूगेशन, वॉशिंग और इवापोरेशन जैसे कई जटिल चरण होते हैं, जबकि आरपीडी में केवल दो स्टेप, एब्जॉर्प्शन और डीसॉर्प्शन से सैंपल तैयार हो जाता है। सॉल्वेंट की खपत भी आरपीडी में बेहद कम सिर्फ 1 से 2 एमएल है, जबकि पहले में 100–200 एमएल तक सैंपल की जरूरत पड़ती थी। सैंपल कंजंप्शन में भी आरपीडी बेहतर है। खून के सैंपल के मामले में केवल 1 एमएल काफी होता है, जबकि एलएलई में 4–5 एमएल तक जैविक फ्लुइड चाहिए होता है और टिशू सैंपल के लिए 1 -5 ग्राम सामग्री लेनी पड़ती है।
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एक ऐसा डिवाइस विकसित किया है, जो खून और पेशाब में जहर की पहचान अब पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक तरीके से कर सकेगा। रोटेटिंग पेपर डिस्क (आरपीडी) नामक इस तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है। न केवल यह डिवाइस जांच की रफ्तार बढ़ाएगा, बल्कि इसकी लागत भी बेहद कम है।
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आरपीडी को सीएफएलएल चंडीगढ़ की निदेशक डॉ सुखमिंदर कौर के मार्गदर्शन में डॉ. राजीव जैन और पीयू की भारती जैन व अन्य ने मिलकर बनाया है। इस नई तकनीक के विकसित होने से पहले पारंपरिक लिक्विड लिक्विड एक्सट्रैक्शन (एलएलई) तकनीक से विभिन्न प्रकार के जैविक नमूनों (खून व यूरिन) से मादक पदार्थों और अन्य दवाओं की जांच होती थी।
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एलएलई तकनीक में डीप्रोटीनाइजेशन, फेज सेपरेशन, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन, सेंट्रीफ्यूगेशन, वॉशिंग और इवापोरेशन जैसे कई जटिल चरण होते हैं, जबकि आरपीडी में केवल दो स्टेप, एब्जॉर्प्शन और डीसॉर्प्शन से सैंपल तैयार हो जाता है। सॉल्वेंट की खपत भी आरपीडी में बेहद कम सिर्फ 1 से 2 एमएल है, जबकि पहले में 100–200 एमएल तक सैंपल की जरूरत पड़ती थी। सैंपल कंजंप्शन में भी आरपीडी बेहतर है। खून के सैंपल के मामले में केवल 1 एमएल काफी होता है, जबकि एलएलई में 4–5 एमएल तक जैविक फ्लुइड चाहिए होता है और टिशू सैंपल के लिए 1 -5 ग्राम सामग्री लेनी पड़ती है।
पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है आरपीडी डिवाइस
पर्यावरण के लिए सुरक्षित आरपीडी डिवाइस बायोडिग्रेडेबल सेल्यूलोज पर आधारित है, जबकि एलएलई में क्लोरोफॉर्म, डाइक्लोरोमीथेन, डाइएथर जैसे जहरीले कार्बनिक सॉल्वेंट उपयोग होते हैं। प्रोसेसिंग क्षमता की बात करें तो आरपीडी डिवाइस में 10 सैंपल यानी 2 केस को मात्र 40 मिनट में प्रोसेस किया जा सकता है, जबकि एलएलई तकनीक में एक सैंपल को तैयार करने में 1 से 4 दिन तक लग सकते हैं। एलएलई की प्रति सैंपल लागत 500 से 1000 रुपये तक आती है, जो सॉल्वेंट व कांच के टेस्ट ट्यूब्स आदि के कारण काफी महंगी साबित होती है। वहीं, आरपीडी डिवाइस की प्रति सैंपल लागत मात्र 25 रुपये से भी कम है।कैसे काम करता है आरपीडी डिवाइस
इस डिवाइस में सेलुलोज पेपर को 1-ऑक्टानोल के साथ सैंडविच की तरह बनाया गया है, जिसमें बीच में एक चुंबकीय छड़ रखी गई है। इसे जैविक नमूनों में डुबोकर 400 आरपीएम की गति से 30 मिनट तक घुमाया जाता है। इससे पेपर पर विश्लेषण के लिए जरूरी रसायन चिपक जाते हैं। इसके बाद पेपर से उन रसायनों को मेथनॉल में निकालकर जीसी-एमएस तकनीक से जांच की जाती है।राजौरी रहस्यमयी मौतों का मामला भी आरपीडी डिवाइस ने सुलझाया
राजौरी जिले के बदहाल गांव में दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच हुई 17 लोगों की रहस्यमयी मौतों के पीछे की वजह का खुलासा भी सीएफएसएल चंडीगढ़ ने आरपीडी डिवाइस से किया था। सीएफएसएल चंडीगढ़ की टीम ने घटनास्थल से 650 से अधिक नमूने इकट्ठा किए और 51 केसों की जांच की।टॉक्सीकोलॉजी जांच में पाया गया कि सभी मृतकों के शवों, खानों, बर्तनों और कपड़ों में एक जहरीला कीटनाशक क्लोर्फेनापाइर मिला। विशेष जांच में आटे, मक्का की रोटी और बर्तन में क्लोर्फेनापाइर की मौजूदगी पाई गई। यह एक खतरनाक कीटनाशक है, जिसकी वजह से लक्षण देरी से प्रकट होते हैं और इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है। यह भारत में रिपोर्ट हुआ क्लोर्फेनापाइर जहर का पहला बड़ा मामला है।