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रिसर्च में खुलासा, खतरे में कबड्डी के खिलाड़ियों का कैरियर

Mon, 16 May 2016 01:47 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 16 May 2016 01:47 AM IST
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Research revealed, career of kabaddi players at risk
kabaddi - फोटो : file photo

खेल के मैदान में खिलाड़ियों का चोटिल होना तो आम बात है, लेकिन कबड्डी के खेल ने सभी के होश उड़ा रखे हैं। सेक्टर 32 स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल (जीएमसीएच) के आरथोपेडिक्स डिपार्टमेंट के प्रोफेसरों ने अपनी एक रिसर्च में पाया है कि कबड्डी के खिलाड़ियों के सबसे ज्यादा घुटने टूट रहे हैं।

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 चोटे लग रही हैं, वे काफी गंभीर हैं। इससे खिलाड़ियों का कैरियर खतरे में पड़ रहा है। शोधकर्ता भी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर कबड्डी के खेल में ऐसा क्या है, जिससे उनके खिलाड़ी चोटिल हो रहे हैं। इस बारे में जब कबड्डी के कोच से बात की गई तो उनका भी मानना था कि डाक्टरों का शोध पूरी तरह से सच है। कुछ साल पहले कुछ नियमों में बदलाव किया गया है, जिससे खिलाड़ी काफी संख्या में घायल हो रहे हैं। उनके मुताबिक पहले इस खेल में खिलाड़ी आठ से दस साल तक एक्टिव रहता था, लेकिन अब जो हालात बन रहे हैं, उसके मुताबिक खिलाड़ी चार से पांच साल तक  सरवाइव कर पाएगा।
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डाक्टरों ने शोध में क्या पाया
जीएमसीएच 32 के आरथोपीडिक सर्जन डा. रवि गुप्ता ने टीम के सदस्यों के साथ जनवरी 2005 से लेकर अप्रैल 2015 तक स्पोर्ट्स इंजरी क्लीनिक  में आने वाले 638 खिलाड़ियों की चोटों पर स्टडी की। इनमें 44 प्रतिशत खिलाड़ी कबड्डी के थे, जिनके घुटने टूटे हुए थे। उसके बाद फुटबाल के खिलाड़ियों का नंबर आता है। 16.3 प्रतिशत फुटबाल खिलाड़ी चोटिल थे। डाक्टरों ने अपनी जांच पाया कि े कबड्डी के खिलाड़ियों के घुटने अंदर से बुरी तरह से जख्मी थे। सही ट्रीटमेंट मिलने पर उन्हें ठीक होने में कम से कम तीन से चार महीने का वक्त लग सकता है। इतनी गहरी चोट लगने से खिलाड़ियों के वापसी करने में भी संशय रहेगा।

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कबड्डी के खेल के नियमों में भी बदलाव की सिफारिश

Research revealed, career of kabaddi players at risk
कबड्डी प्रतियोगिता - फोटो : file photo

डाक्टरों ने क्या की सिफारिश स्टडी के बाद डाक्टर भी हैरान हैं कि आखिर कबड्डी के खिलाड़ियों को इतनी चोटें क्यों लग रही हैं। उन्होंने अपनी स्टडी के बाद पालिसी मेकर से सिफारिश की है कि जिस तरह से क्रिकेट के नियमों में समय-समय पर बदलाव किए गए हैं, उसी प्रकार से कबड्डी के खेल के नियमों में भी बदलाव किए जाएं, ताकि खिलाड़ियों का कैरियर प्रभावित न हो। डाक्टरों का कहना है कि अन्य खेलों में भी खिलाड़ियों के घुटने चोटिल हो रहे हैं। इसलिए एक और स्टडी की जरूरत है, जो खास तौर पर एसीएल (घुटने के जोड़ की चोट) पर फोकस हो, ताकि हर गेम के लिए अलग से रक्षात्मक प्रोग्राम तैयार किया जा सके।

कबड्डी कोच भी सहमत चंडीगढ़ के कबड्डी कोच देविंदर सिंह कोहली ने बताया है कि पहले कबड्डी का खेल मिट्टी में खेला जाता था, लेकिन पिछले पांच से छह सालों से मैट पर खेला जा रहा है। मैट में खिलाड़ियों को शूज पहनने पड़ते हैं, इससे मूवमेंट काफी तेजी से होती है। इससे खिलाड़ियों का लिगामेंट टूटना आम है। मैट एक या डेढ़ मीटर की होती है। मैट को जोड़ने के लिए लॉक लगाया जाता है। पूरे मैदान में 200-250 से ज्यादा मैट का इस्तेमाल होता है। इतने मैट में जाने कितने लॉक होंगे, यह भी एक चोट का कारण बनता है।

किस खेल की कितनी इंजरी (संख्या और प्रतिशत
खेल            इंजरी

कबड्डी          285 (44.7)
फुटबाल        104  (16.3)
एथलेटिक्स   54 (8.5)
वॉलीबाल     34 (5.3)
बास्केटबाल    31 (4.9)
रेसलिंग         23 (3.6)
बैडमिंटन       17 (2.7)
बाक्सिंग        4  (0.6)
कराटे          2  (0)
कोट-
कबड्डी के खेल में सभी नौजवान होते हैं। ये सभी हमारे देश के भविष्य हैं। ऐसे में यदि उन्हें चोट लगेगी तो देश का भविष्य भी बर्बाद होगा। हमने देखा है कि जो चोट कबड्डी के खिलाड़ियों को लगीं, वे काफी खतरनाक और गंभीर थीं। उन्हें ठीक तो किया जा सकता है, लेकिन इतनी मात्रा में चोट लगना कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में पालिसी मेकर और खेल विशेषज्ञों को इस बारे में सोचना चाहिए, ताकि खिलाड़ियों का भविष्य सुंदर और सुरक्षित बने।
डा. रवि गुप्ता,  प्रोफेसर आरथोपीडिक्स, जीएमसीएच 32

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