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'गायन के 3 दुश्मन होते हैं, यहां तो तीनों ही हैं'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 21 Feb 2016 11:22 AM IST
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हवा के ठंडे झोंके ने ध्यान भटकाया तो नजर पड़ी सामने खेलते बच्चे और उसे पुकारते-संभालते व्यक्ति पर। अचानक गायन रुका और चेहरे पर मुस्कराहट तैर गई। साथ ही हंसते हुए बोले- गायन के तीन दुश्मन हैं- बालक, वात और संवाद। यानी बच्चों की क्रीड़ा, हवा का चलना और लोगों का बातचीत करना। यह ध्यान भटकाते हैं। यहां तो तीनों ही हैं।
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जगह थी रोज गार्डन और मंच पर थे संगीत के बनारस घराने से संबंध रखने वाले प्रसिद्ध ठुमरी गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र। उनकी आवाज गूंजी और ‘दिगंबर खेले मशाने में होली’ की लय में श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। भगवान शंकर की होली का रंग चढ़ने लगा था। रंग और गहरा हुआ केवट और राम के संवाद से।
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छन्नू लाल ने गाया ‘केवट उतरि दंडवत कीन्हा, प्रभु सकुचे एहि कछु नहिं दीन्हा। पिय हिय की सिय जाननिहारी, मणि मुदरी मन मुदित उतारी।’ और फिर समझाया कि केवट के हठ पर उससे चरण-प्रक्षालन करा कर उसकी नौका से गंगा पार करने के बाद भगवान रामचंद्र जी संकोच में पड़ गए कि केवट को कुछ दे नहीं पा रहे हैं। फिर सीता माता उनके मन भगवान के मन की बात जान लेती है और अपनी अंगूठी उतार कर देती है। उनकी बात खत्म होते ही पंडाल भी तालियों से गूंज उठा। मिश्र जी के पास फरमाइश आई चैती, ठुमरी और कबीर के भजन की।
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उन्होंने तत्काल कह दिया कि वैसे तो वह फरमाइश पूरी नहीं करते पर यह उनके प्रिय की तरफ से है पर यह आखिरी फरमाइश होगी। ‘सेजिया से सइयां रूठि गइलैं हो रामा, कोयल तोरी बोलिया’ सुनाने के दौरान उन्होंने एक कविता भी सुनाई- नागिन बैठी राह में, बिरहन पहुंची आय, नागिन डरपै आप को बिरहन डस ना जाय।
नाहर के नख में बसै (विष) दन्ते बसै भुजंग, बिच्छी के पोंछी बसै बिरहन के सब अंग। नागिन के डरने और बिरहन के अंग-अंग में जहर होने की बात सुन श्रोता हंस पड़े। कार्यक्रम का अंत ठुमरी और कबीर के भजन से हुआ। पर श्रोता कहां मनाने वाले थे। एक और फरमाइश की पर्ची आ गई। हाथ हिलाते हुए मिश्र जी बोले न भाई न। इतने लोग हैं यहां। अगर उनकी फरमाइश ही पूरी करता रहा तो यहीं दम निकल जाएगा।