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#हिंदी हैं हम: पाठकों ने भेजीं अपनी रचनाएं- गुरु की महिमा अपरंपार, गुरु सा त्यागी कोई नहीं
Sun, 06 Sep 2020 11:10 AM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Sun, 06 Sep 2020 11:10 AM IST
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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अमर उजाला के ‘हिंदी है हम’ अभियान के प्रति पाठकों का उत्साह बढ़ता ही जा रहा है। रोजाना प्राप्त हो रहीं ई-मेल इस बात का सुबूत हैं कि पाठकों में हिंदी के प्रति गजब का प्रेम है। सिर्फ बड़े ही नहीं बल्कि विद्यार्थी भी अपनी लिखी हुईं रचनाएं भेज रहे हैं। जगह की कमी के कारण कुछ ही रचनाएं प्रकाशित हो पा रही हैं। कविता व लेखन के लिए जो पैमाने (शब्द सीमा और फोटो) तय किए गए हैं, उन पर खरी उतरने वाली सभी रचनाओं को अवश्य प्रकाशित किया जाएगा। आप रचनाएं भेजते रहिए।
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गुरु
गुरु का महत्व जीवन में, किसी से भी छिपा नहीं
गुरु का है आशीर्वाद जिस पर, वह जीवन में पीछे मुड़ा नहीं
गुरु की महिमा अपरंपार, गुरु सा त्यागी कोई नहीं
अपनी खुशियां बच्चों में ढूंढे, ऐसी खुशहाली किसी के पास नहीं
मात-पिता ने जन्म दिया और प्रथम गुरु भी है वही
जीवन के सभी आदर्श, हमें मिला उनसे ही
नित जीवन का महत्व समझने, दूर गए मात-पिता से राम भी
मात-पिता सा स्नेह दिया गुरु ने, ऐसे गुरु हैं सबके ही
हे गुरु मेरा नमन आपको, आपकी एक वाणी बदल देती जिंदगी
जो समझे आपको बन जाए राजा, स्वीकार करो मेरी बंदगी
-श्रद्धांजलि कर, विद्यार्थी मोहाली
हिंदुस्तान सारा ही तुम्हारा है
हुए नाराज तुम अपने वतन सुन देश हारा है
न कर बदनाम हिंदुस्तान सारा ही तुम्हारा है
बना ये वक्त कैदी लोग कुछ आए पराए थे
गए जो बेच भारत दोष जो था वो हमारा है
वतन के दर्द से जुड़ना तिरंगा देखता तुमको
लगेगा देश अपना खूबसूरत हर नजारा है
वतन उसका रहेगा जो शहादत दे गए हमको
वतन को हिंदु-मुस्लिम, सिख, ईसाई ने संवारा है
जहां उर्दू वहां हिंदी रहेगी साथ ही दोनाें
अलग होंगे नहीं चाहे लगा लो जोर सारा है
सियासत ने मुहब्बत को जहर देते पवन देखा
सियासत ने कुचलकर रौंदकर दिल देश मारा है
-पवन बत्तरा, समाजसेवक, पंचकूला
पापा
थाम कर हाथ बचपन में चलना सिखाया
मुश्किलें हों सामने तमाम फिर भी उनसे लड़ना सिखाया
छोटी सी नादानियों पर सुनाई प्यार भरी फटकार
मेरी जीत पर खुशियां मर्नाइं, हार पर सिखाया उसे करना स्वीकार
कभी दोस्त बने तो कभी गुरु की मूरत
पापा दिल में बसी रहेगी आपकी प्यारी सूरत
कंधों पर अपने झूला झुलाया, बनाकर रखा अपना दुलारा
कभी कदम लड़खड़ाए तो पापा बने मेरा सहारा
याद आता है आज भी पापा का सुनाया हर किस्सा
हमेशा रहेंगे आप मेरे जीवन का अनमोल हिस्सा
-संदीप नेगी, जीरकपुर
मन की बात
मन में थी एक बात, जो आज मैंने कह डाली
छोड़ा घर बाबुल का, नया प्यार पाने चली
दिया साथ सभी ने, मुझे अपना बनाने में
हुई नोकझोंक भी, पर कहते है ना, जिंदगी का हिस्सा भी है यही
सब से मिलके, मिले नए रिश्ते मुझे यहीं
मन में थी एक बात, जो आज मैंने कह डाली
हर रिश्ते के मायने नजर आए, जब देखीं ये दुनिया नई
कुछ पल के बाद एक नया एहसास हुआ मुझे
जुड़ने लगी एक और जिंदगी नई
उसका एहसास अपना वजूद देने लगा
जैसे लगा पुकार रहा हो मुझे कोई
मन में थी एक बात, जो आज मैंने कह डाली
-सुषमा, मलोया, चंडीगढ़
हिंदी हमारे देश की राजभाषा है। हमें गर्व होना चाहिए कि हम हिंदी भाषी हैं। हमें देश की राजभाषा का सम्मान करना चाहिए। हमारे देश में सभी धर्मों के लोग रहते हैं। उनके खान-पान, वेश-भूषा अलग-अलग है, पर एक हिंदी ही है, जो सभी धर्मों के लोगों को एकता में जोड़ती है। जिस तरह हम अपने तिरंगे को सम्मान देते हैं। उसी प्रकार अपने देश की राजभाषा को भी सम्मान देना चाहिए। हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तान हमारा’ ये शब्द देश की शान में लिखे गए हैं और हमें गर्व महसूस कराते हैं। अपने अंदर और दिलो-दिमाग में यह सोच होनी चाहिए कि पहले अपना देश आता है। बाद में दूसरा देश। जय हिंद जय भारत। -सुलेखा, विद्यार्थी, पिंजौर
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गंगा अंतिम गंतव्य
हे भ्रमित मानव! क्या साक्षात करना चाहोगे
स्वयं के अस्तित्व का....क्या उपसंहार विदित है तुम्हें
देह के पंचतत्व का....बस अंजुली भरने पानी की
जाना गंगा तट पर, खंडित होगा अभिमान तेरा
इतराए जो यूं घट पर, अंजुली नीर में श्रवण करना
आत्माओं के रव का....तेरे अपने भी नहीं रख पाते
तेरी राख की हंडिया को, तब देती है मुक्ति संतान को
नमन इस गंगा मइया को, मत प्रदूषित कर भागीरथी
बोध है यह ब्रह्मतत्व का हे भ्रमित मानव !
क्या साक्षात करना चाहोगे, स्वयं के अस्तित्व का....
-डा. अनीश गर्ग, चंडीगढ़