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Hindi News ›   Chandigarh ›   Read these Unique Love stories on Valentine's Day

वैलेंटाइन डे पर पढ़ें ये प्रेम कहानियां : जज्बे से हुई इनके प्रेम की जीत, मजहब की दीवार तोड़ बने एक-दूजे के मीत

Sun, 14 Feb 2021 04:56 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 14 Feb 2021 04:56 PM IST
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Read these Unique Love stories on Valentine's Day
डॉ. आंचल और तेजिंदर। - फोटो : अमर उजाला

इश्क न जाने मंदिर-मस्जिद, इश्क न जाने काशी-काबा... प्रेम से बड़ा न कोई मजहब है न कोई जाति। आज भी हमारे समाज में कई ऐसे जोड़े हैं, जिन्होंने प्यार को मजहब और जाति से अलग होकर सिर्फ देखा ही नहीं उसे स्वीकार किया और हंसी-खुशी जिंदगी बिता रहे हैं। अलग-अलग धर्म और जाति से होते हुए अपने साथी के साथ जिंदगी गुजारने का फैसला किया।

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 हां, समाज और परिवार के विरोध का सामना जरूर करना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी सफलता से यह साबित कर दिया कि प्यार किसी धर्म या जाति का मोहताज नहीं, प्यार तो प्यार है। आइए, वेलेंटाइन डे के इस खास मौके पर आपको ऐसे ही कुछ शादीशुदा जोड़ों की कहानी से रूबरू करवाते हैं...
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सच्चे प्यार की हुई जीत... हारी बाजी जीतकर बने एक-दूसरे के मीत 
सेक्टर- 44 के रहने वाले तेजिंदर सिंह और उनकी पत्नी डॉ. आंचल स्वामी का धर्म अलग-अलग है। तेजिंदर सिख समुदाय से आते हैं, जबकि आंचल ब्राह्मण परिवार से। आंचल ने बताया कि साल 1998 में वह तेजिंदर से मिली थीं। उस समय वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थीं। तेजिंदर उनकी सहेली के भाई का दोस्त था। 
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जन्मदिन की पार्टियों में अक्सर दोनों की मुलाकातें होती रहती थीं। कुछ समय बाद बात शुरू हुई। आंचल के माता-पिता थोड़े सख्त थे। इसलिए आंचल माता-पिता से छिपकर तेजिंदर से बात करती थी। धीरे-धीरे मुलाकातें प्यार में बदल गईं। साल 2004 में तेजिंदर ने आंचल को प्रपोज कर दिया। आंचल ने भी हां बोल दिया। दोनों की मुश्किलें तब बढ़ गई, जब शादी का प्रस्ताव घरवालों के पास पहुंचा। आंचल के परिजनों ने शादी से साफ इनकार कर दिया।

परिवार वालों का कहना था कि दूसरा धर्म होने के कारण रीति-रिवाजों, त्योहारों, संस्कृति हर चीज में अलग होने की समस्या आएगी। उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि उनकी बेटी को वहां कैसा माहौल मिलेगा। परिवार ने आंचल पर हिंदू धर्म के किसी भी लड़के से शादी का दबाव बनाया। दबाव इतना बढ़ गया कि तेजिंदर ने भी आंचल को कहीं और शादी करने की इजाजत दे दी। 

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अली और पूनम। - फोटो : अमर उजाला

दोनों उम्मीद हार चुके थे। सपने बिखरने वाले थे कि दोनों ने आखिरी बार परिवार को मनाने की कोशिश की। इस दौरान स्कूल के दोस्तों ने भी आंचल के परिवार को मनाया। आखिरकार दोनों परिवार शादी के लिए राजी हो गए और साल 2009 में दोनों की शादी सिख रीति-रिवाजों के मुताबिक हुई। आज आंचल के परिवार का कहना है कि इतना अच्छा दामाद वह खुद ढूंढ कर भी नहीं ला सकते थे। आंचल पेशे से डेंटल सर्जन हैं और उनका डेराबस्सी में क्लीनिक है, जबकि तेजिंदर का चंडीगढ़ में इमिग्रेशन का बिजनेस है।

नफरतों के बीच मिसाल हैं अली और पूनम प्यार 
मंच पर कलाकारी करने वाले अली और पूनम के दिल के तार आपस में कब जुड़ गए उन्हें पता ही नहीं चला। जब दोनों को लगा कि एक-दूसरे के साथ जीवन जीना है तो फिर धर्म की दीवार भी उनके प्यार को जुदा नहीं कर सकी। शुरुआत में परिवार के मनमुटाव से थोड़ी परेशानी हुई लेकिन बाद में सब मान गए। दोनों सेक्टर- 11 के एक स्कूल में पढ़ते थे। फिर दोनों एक थियेटर समूह से जुड़ गए और नाटक का मंचन करने लगे। 

धीरे-धीरे यह मुलाकात प्यार में बदल गई। जब दोनों ने एक होने का फैसला लिया तो परिवार में भूचाल आ गया। काफी सारी मुश्किलें आईं लेकिन समय हर जख्म को भर देता है। दोनों ने बड़े धैर्य से परिवार को मनाया। पिछले साल दोनों को एक बेटा हुआ और यह बच्चा दोनों के परिवार के लिए जैसे एक सेतु की तरह था। आज दोनों के परिवार अपने बच्चों के फैसले पर नाज करते हैं। दोनों ने अपने प्यार पर कभी धर्म को आगे नहीं रखा है। उनका सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है। वे एक दूसरे के धर्म का आदर व सत्कार करते हैं। अली ने शादी से एक दिन पहले अपने घर पर एक मंदिर बनवा दिया।

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दीपिका और गिरीश। - फोटो : अमर उजाला

अली सभी हिंदू त्योहारों को धूमधाम से मनाते हैं। दीपावली पर वे पूनम के अभिभावकों के घर जाकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं, जबकि ईद के दौरान पूनम के परिवार वाले उनके घर आते हैं। अली थियेटर कर रहे हैं, जबकि पूनम पीजीआई में नौकरी। 

बंगलूरू में हुआ प्यार कुछ ऐसे चढ़ा परवान
पंजाब यूनिवर्सिटी में रहने वाले दीपिका व गिरीश की प्रेम कहानी चेतन भगत के उपान्यास टू स्टे्स जैसी है। दीपिका चंडीगढ़ की रहने वाली हैं जबकि उनके पति गिरीश साउथ के रहने वाले। शादी से पहले दोनों बंगलूरू की एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे। दोनों के बीच प्यार पनपा और शादी के लिए परिवार को मनाने लगे। 

दीपिका की फैमिली पहले तैयार नहीं हुई। उनके परिजनों का कहना था कि उनकी बेटी दक्षिण भारत के परिवार में कैसे सामंजस्य बैठा पाएगी। इस बीच दीपिका का परिवार मुंबई आ गया। दीपिका के कहने पर वे बंगलूरू गिरीश के घर चले गए। गिरीश के परिवार की खातिरदारी और उनका व्यवहार देखकर वे काफी खुश हुए और शादी के लिए राजी हो गए। 

दीपिका पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनियर असिस्टेंट हैं, जबकि गिरीश प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं। दोनों की संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन बिल्कुल अलग है लेकिन प्यार के बीच ये सब कभी बाधा नहीं बनीं। दीपिका ने बताया कि भाषा में कई तरह की दिक्कतें आईं। वहां पर कन्नड़ और तेलगू भाषा बोली जाती है जबकि गिरिश के परिवार वालों को हिंदी और पंजाबी भाषा समझ नहीं आती थी। लेकिन धीरे-धीरे दोनों परिवारों ने दोनों ही प्रांतों की काम चलाऊ भाषा सीख ली है।

‘चेन्नई एक्सप्रेस’ जैसी है इंदरप्रीत और ऋषि की प्रेम कहानी

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इंद्रजीत और ऋषि। - फोटो : अमर उजाला

चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म जैसी है सीएसआईओ की प्रिंसिपल साइंटिस्ट प्रो. इंदरप्रीत और उनके पति ऋषि की प्रेम कहानी। प्रो. इंदरप्रीत ने बताया कि 15 साल पहले उनकी पहली मुलाकात जालंधर में हुई थी। उन्हें पहली नजर में ऋषि पसंद आ गए थे। ऋषि ने बताया कि वह एक बैंक में जोनल हेड के पद पर कार्यरत हैं। 

इंदरप्रीत की चचेरी बहन उनके बैंक में थीं। दोनों की बातचीत के दौरान इंद्रप्रीत की काफी तारीफ और चर्चे होते थे। इससे ऋषि के मन में इंद्रप्रीत के प्रति आकर्षण बढ़ा। दोनों की मुलाकात हुई तो बात शादी की ओर बढ़ी लेकिन असली लड़ाई अब शुरू होने वाली थी। इंद्रपीत पंजाबी सिख फैमिली से थीं तो ऋषि केरल के।

इंदरप्रीत ने बताया कि उनके परिवार ने साफ तौर पर कह दिया कि उनकी शादी सिख परिवार में ही होगी लेकिन दोनों ने उम्मीद नहीं छोड़ी। अपनी तरफ से प्रयास शुरू कर दिए। इंदरप्रीत के बड़े भाई ने ऋषि से मुलाकात की। उन्हें भी ऋषि पसंद आ गए। ट्रेनिंग के लिए जब इंदरप्रीत हैदराबाद गई तब वहां ऋषि ने उन्हें अपने माता-पिता से मिलवाया।

काफी जद्दोजहद के बाद आखिर दोनों के परिवार ने निर्णय को स्वीकार कर लिया। दोनों के रीति रिवाज अलग थे लेकिन कभी भी दोनों परिवार के बीच किसी तरह की परेशानी नहीं आई। शादी के कुछ साल बाद इंद्रप्रीत ने एक बेटी को जन्म दिया। कुछ परिस्थितियां ऐसी बनी कि उन्होंने दूसरा बच्चा गोद लेने का मन बनाया। ऋषि ने उनके इस निर्णय में भरपूर सहयोग दिया। आज ऋषि इंदरप्रीत अपनी दोनों बेटियों के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

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