अंगदान महादान: कभी अलविदा ना कहना...धड़क रहा हूं किसी के सीने में, किसी को दिखा रहा हूं दुनिया
पीजीआई रोटो के नोडल अधिकारी प्रो. विपिन कौशन का कहना है कि अंगदान जागरूकता के लिए व्यापक काम करने की जरूरत है, क्योंकि मौतों का आंकड़ा बताता है कि अगर शत प्रतिशत अंगदान किया जाए तो अंग की कमी से होने वाली मौतों पर काबू पाया जा सकता है। अंग अमूल्य हैं, उसे जलाकर राख करने के बजाय दान कर दुनिया से जाने के बाद भी दुनिया में रहकर मिसाल कायम करने की सोचिए।
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दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां, कैसे ढूंढे कोई उनको, नहीं कदमों के भी निशा... अंगदान ने इन लाइनों को गलत साबित कर दिया है, क्योंकि अंगदान के माध्यम से दुनिया से जाने के बाद भी कोई किसी के सीने में दिल बनकर धड़क रहा है तो कोई दूसरों की आंखों से दुनिया से जाने के बाद भी दुनिया देख रहा है। देश में अंगदान की स्थिति बेहद निराशाजनक है फिर भी हमारे बीच चंद ऐसे परिवार हैं जो अपनों को खोने के गम भूलकर दूसरों को जीवनदान देने का निर्णय ले रहे हैं।
पीजीआई ने किया ब्रेड डेड घोषित, परिवार ने लिया अंगदान का निर्णय
पापा ने हमें बचपन से एक ही बात सिखाई थी कि दूसरों को खुशियां बांटना चाहिए। रोते को हंसाने से अपने सारे गम दूर हो जाते हैं। उनके इस मूलमंत्र को वास्तविकता में बदलते हुए हमने उनके अंगदान का निर्णय लिया था। यह कहना है सेक्टर- 52 निवासी अंजलि का। उनके परिवार ने अंजलि के पिता अश्वनी कुमार के 18 अगस्त 2021 को ब्रेन डेड होने पर उनकी किडनी और कार्निया दान करने की हामी भरी।
अंजलि अश्वनी की तीन बेटियों और एक बेटे में सबसे बड़ी संतान हैं। अंजलि ने बताया कि सड़क दुर्घटना में घायल होने पर उनके पिता को 14 अगस्त को पीजीआई में भर्ती किया गया था, जहां इलाज के दौरान उन्हें 18 को ब्रेन डेड घोषित किया गया। उस समय जब कोआर्डिनेटर ने उनके अंगदान की बात कही तो एक पल के लिए सभी चौक गए। लेकिन पापा से मिली परवरिश और उन्हें दुनिया में अमर करने की लालसा ने मम्मी और हम भाई-बहनों को हामी भरने की ताकत दी। ऐसा लगता है पापा अब भी हमें कहीं से निहार रहे हैं और अपने प्यार से अविभूत कर रहे हैं। अब ये लगता है कि उस दौरान लिया गया वे निर्णय कितना कठिन था लेकिन उस एक निर्णय ने अमूल्य अंगों को राख बनने से रोक लिया।
उस अजनबी अंगदाता के परिवार को नमन, जिनके निर्णय से मुझे मिला नया जीवन
आठ साल की उम्र में पता चला कि मैं मधुमेह का शिकार हो गया हूं। भाइयों के साथ खेलने और खाने पर पाबंदी लग गई। सब कुछ ऐसा हो गया जैसे जिंदगी कोई सजा हो। यह कहना है जीरकपुर निवासी 29 साल के हरविंदर सिंह का, जिन्हें किडनी और पैनक्रियाज प्रत्यारोपण से नया जीवन मिला है।
हरविंदर ने बताया कि मधुमेह के कारण पैनक्रियाज पहले से खराब हो गए थे। 2013 में दोनों किडनी भी खराब हो गई। डायलिसिस पर दो साल जिंदा रहा। अचानक 21 अगस्त 2015 को पता चला कि मेरे मैचिंग का किडनी और पैनक्रियाज मिल गया है। वह सूचना मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। ड्राइवर का काम करने वाले मेरे पिता के लिए मेरा इलाज कराना संभव नहीं था। ऐसे में प्रत्यारोपण ने एक आशा की किरण दिखाई। 21 अगस्त को मुझे किडनी और पैनक्रियाज प्रत्यारोपित किया गया। कुछ सावधानियों का पालन करते हुए मैं अब एक सामान्य जीवन जी रहा हूं।
अंग खराब होने के कारण जो जीवन मेरे लिए अभिश्राप बन गया था, उसमें खुशियां लौट आई हैं। अब मैं नौकरी करता हूं। ये सब संभव हो सका है, उस अजनबी अंगदाता परिवार की बदौलत जिसके एक निर्णय ने मुझे नया जीवन दे दिया।