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पीयू की बड़ी उपलब्धि  : केंद्र सरकार ने एक साथ मंजूर किए पांच पेटेंट, फार्मा विभाग की बड़ी सफलता 

अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 25 Jul 2021 02:35 AM IST

सार

  • ये लाभ मिलेगा.. विटामिन-डी के लिए बन सकेगी ओरल वैक्सीन
  • काला मोतिया के लिए बार-बार नहीं डालनी होगी दवा
  • आंख के पिछले हिस्से में इंजेक्शन के जरिए पहुंचने वाली दवा अब ड्रॉप के जरिए आसानी से जा सकेगी
  • पीयू की वरिष्ठ प्रो. इंदु पाल कौर ने शोध कर तकनीक व फॉर्मूला बनाया
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पंजाब यूनिवर्सिटी
पंजाब यूनिवर्सिटी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

पंजाब यूनिवर्सिटी के फार्मास्युटिकल विभाग को बड़ी उपलब्धि हाथ लगी है। भारत सरकार ने एक साथ पांच पेटेंट  मंजूर किए हैं। हर पेटेंट का जनता को किसी न किसी रूप में लाभ मिलेगा। इनमें तीन बड़े शोध हैं, जिनके जरिए फॉर्मूला व तकनीक विकसित की गई हैं। इनसे कई लाभ होंगे। पहला विटामिन डी की पूर्ति के लिए ओरल वैक्सीन बन सकेगी। दूसरा काला मोतिया के लिए बार-बार दवा डालने की जरूरत नहीं होगी और तीसरा आंख के पिछले हिस्से में दवा पहुंचाने के लिए इंजेक्शन नहीं लगवाना पड़ेगा। दवा ड्रॉप के जरिए ही पहुंच सकेगी।
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पीयू के फार्मास्युटिकल विभाग की चेयरपर्सन एवं वरिष्ठ प्रोफेसर इंदु पाल कौर ने ये शोध किए हैं। उनके नाम 20 पेटेंट दायर हैं। अमेरिका से भी उन्हें एक पेटेंट मिला है। चार से पांच तकनीकें उद्योगों को हस्तांतरित की जा चुकी हैं। वह विश्व के दो फीसदी प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में शामिल हैं। उनके शोध सर्वोच्च रैंक वाले हैं। उनके नाम कई पुरस्कार भी हैं। प्रो. इंदु पाल कौर के निर्देशन में रोहित भंडारी, मोनिका यादव, मंदीप सिंह, शिल्पा कक्कड़, रिची तनेजा, केशव जिंदल, इक्षिता शर्मा आदि शोधार्थियों ने अपने-अपने शोध पर बेहतर काम किया।


इस तरह हुआ शोध

शोध नंबर-1 
भारत के अधिकांश लोगों की डार्क स्कीन है। सूरज के जरिए मिलने वाला विटामिन डी जल्दी त्वचा में प्रवेश नहीं कर पाता। दवा आदि भी लेने से उसका असर अधिक देर तक शरीर में नहीं बना रहता। टीबी प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में विटामिन डी का अभाव होता है। शोध के जरिए ऐसा फॉर्मूला तैयार किया गया है जो विटामिन डी की दवाओं का प्रभाव कई गुना बढ़ाएगा जो त्वचा में कई घंटे या दिनों तक बना रहेगा। इस फॉर्मूले के जरिए कंपनियां विटामिन डी की ओरल वैक्सीन बना सकेंगी। इस शोध में शोधार्थी मनोज कुमार वर्मा का भी योगदान है।

शोध नंबर-2
आंख के कई रोगों में दिखना बंद हो जाता है। ऐसे में चिकित्सक आंख के पर्दे के पीछे दवा पहुंचाने के लिए इंजेक्शन लगाते हैं। इसके लिए मरीज को भर्ती होना पड़ता है। साथ ही दवाएं भी महंगी होती हैं। शोध के जरिए एक फॉर्मूला तैयार किया गया है, जो आई ड्रॉप पर ही लागू हो जाएगा। दवा जैसे ही आंख में डालेंगे तो वह उस जगह पर पहुंच जाएगी जहां आंख में दिक्कत है यानी इंजेक्शन लगाने की जरूरत नहीं होगी। शोधार्थी मोनिका यादव का इसमें योगदान है। इसके अलावा एक दूसरे शोध में त्वचा संक्रमण को कम करने के लिए फॉर्मूला तैयार किया गया है। इस शोध में जेफ्री ज्ञान जेबा जेसुडियन, चोकलिंगम विजया का योगदान है।

शोध नंबर-3
ग्लूकोमा (काला मोतिया) के मरीजों को आंख में दिन में तीन से चार बार दवा डालनी पड़ती है। कई बार दवा न डालने के कारण आंख की रोशनी भी चली जाती है। इसके लिए शोध हुआ और फॉर्मूला तैयार किया गया। इसके तहत अब आंख में बार-बार दवा नहीं डालनी होगी। सप्ताह में एक बार दवा डालनी होगी जिसका प्रभाव एक सप्ताह तक बना रहेगा। इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है। देश में तमाम लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। 

इन पेटेंट के जरिए तमाम बीमारियों का इलाज आसान हो सकेगा। तैयार किए गए फॉर्मूलों के जरिए दवाएं अधिक प्रभावी हो सकेंगी।
- प्रो. इंदु पाल कौर, चेयरपर्सन, फार्मास्युटिकल विभाग पीयू

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