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कृषि अध्यादेश पर विशेषज्ञ बोले- किसान 'बकरी' बड़ी कंपनियां 'शेर', छोटे को बड़ा खा जाएगा

Sat, 19 Sep 2020 12:30 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sat, 19 Sep 2020 12:30 AM IST
सार

  • फसल तैयार होते ही कंपनियां दाम गिराकर अनाज स्टोर कर लेंगी
  • अनाज की आपूर्ति न होने पर दाम बढ़ेंगे और फिर कंपनियां स्टोर से निकाल कमाएंगी मुनाफा
  • किसान तो बेचारा है... बड़े प्लेयरों के हत्थे चढ़ जाएगा: प्रो. ज्ञान सिंह बैनीपाल

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Punjab News in Hindi: Agriculture expert views on agricultural ordinances
रिटायर प्रोफेसर ज्ञान सिंह बैनीपाल - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

केंद्र सरकार हाल ही में तीन कृषि अध्यादेश लेकर आई है। यह मॉडल एलपीजी यानी लोकलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन तो 1991 के तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हाराव का है, उस दौरान डॉ. मनमोहन सिंह केंद्रीय वित्तमंत्री थे।

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मॉडल को अब मोदी सरकार तेजी से लागू कर रही है, फर्क इतना है पहले स्पीड कम थी, अब मॉडल ने गति पकड़ ली है। पब्लिक सेक्टरों को खत्म कर निजी सेक्टरों को आगे किया जा रहा है। यही मॉडल अब खेतीबाड़ी सेक्टर पर लागू हो रहा है। तीन अध्यादेशों का असर किसानों पर पड़ेगा।
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केंद्र सरकार का पहला अध्यादेश ‘एक देश, एक कृषि मार्केट’ बनाने का है। इस कानून से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह जैसे खेत, खलिहान, घर और सड़क पर खरीद सकते हैं। किसान भी अपनी फसल को चाहे तो देश के किसी भी शहर, राज्य या किसी भी कोने में ले जाकर बेच सकता है। 

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कृषि माल की बिक्री एपीएमसी यानी कृषि उपज मंडी समिति (एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) यार्ड में होने की शर्त केंद्र सरकार ने हटा ली है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कृषि माल की जो खरीद एपीएमसी से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं लगेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि एपीएमसी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। 

फसल खरीदने वाला व्यक्ति या कंपनी और किसान के बीच विवाद होने पर एसडीएम इसका समाधान करेंगे। प्रशासनिक अधिकारी आगे किसानों की कितनी सुनवाई करते हैं, यह तो सबको पता है। अधिकारी व्यापारियों व सरकार के दबाव में रहते हैं। छोटे किसानों को फसल बेचकर जल्दी पैसों की जरूरत होती है तो ऐसे में वह मजबूरन कम दाम में फसल बेचेगा।

शेर बकरी वाला हिसाब हो जाएगा, शेर बकरी को खा ही जाएगा। खतरा यह है कि जब फसलें तैयार होंगी, उस समय बड़ी-बड़ी कंपनियां जानबूझ कर किसानों के माल का दाम गिरा देंगी और उसे बड़ी मात्रा में स्टोर कर लेंगी, जिसे वे बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगी। सरकार किसानों के माल की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर खरीद की अपनी जिम्मेदारी व जवाबदेही से पूरी तरह से पल्ला झाड़ना चाहती है। 

बिहार में किसानों ने छोड़ी खेती और कमाने निकले

2006 में बिहार सरकार ने एपीएमसी एक्ट खत्म कर किसानों के उत्पादों की एमएसपी पर खरीद खत्म कर दी। उसके बाद किसानों का माल एमएसपी पर बिकना बंद हो गया और प्राइवेट कंपनियां किसानों का सामान एमएसपी से बहुत कम दाम पर खरीदने लगी, जिससे वहां किसानों की हालत खराब होती चली गई। 

इसके परिणामस्वरूप बिहार के किसानों ने बड़ी संख्या में खेती छोड़ मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में चले गए। पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार की कमेटी भी एमएसपी को खत्म करने की बात कह चुकी है, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी एमएसपी को खत्म करने की बात कह चुके हैं। ऐसे में किसानों का शोषण खरीददारों द्वारा शुरू हो जाएगा।

मार्केट में जो दाम वह तय करेंगे, उसी हिसाब से बिकेगा आपका माल
दूसरा अध्यादेश है एसेंशियल कमोडिटी एक्ट: 1955 में आलू, प्याज, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। अब समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। वैसे भी किसान के पास वर्तमान में आय बहुत कम है छोटा किसान हो या बड़ा किसान हो वह अपनी उपज को ज्यादा दिन तक रोकने में सक्षम नहीं है, क्योंकि किसान को फसल कटाई के बाद जल्द पैसों की आवश्यकता होती है। 

बड़ी कंपनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। जो दाम वह तय करेंगे, उसी हिसाब से मार्केट में यह बिकेगा। आज आलू 40 रुपये किलो तक बिक रहा है। इससे किसान तो बुरी तरह प्रभावित होगा ही पर देश का आम उपभोक्ता भी बार-बार महंगाई का शिकार होगा। 

किसान की फसल बोने के 4 से 5 महीना बाद मार्केट में आएगी, तब बड़े प्लेयर अपनी स्टॉक फसल को फिर से मार्केट में निकालेंगे। इससे किसान की फसल आते ही दाम गिर जाएंगे। ऐसे में किसान का शोषण होगा। किसान को मजबूरन सस्ती दाम में फसल को बेचना पड़ेगा।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग: कंपनियां करेंगी खेती, किसान करेंगे मजदूरी
तीसरा अध्यादेश है फार्मर्स एग्रीमेंट ऑन प्राइस इंश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस : कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियां खेती करेंगी और किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से भी किसानों का शोषण ही होगा।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कंपनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कंपनियां किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं। अगर इस दौरान फसल के दाम मार्केट में बढ़ गए तो कांट्रैक्ट लेने वाली कंपनी को फायदा होगा। लेकिन अगर मार्केट में दाम गिर गए हैं तो किसानों के उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर दिया जाता है। किसान तो बेचारा है... बड़े प्लेयरों के हत्थे चढ़ जाएगा, उसका शोषण होना तय है।

लेखक: रिटायर प्रोफेसर ज्ञान सिंह बैनीपाल कृषि विशेषज्ञ हैं और इन दिनों ग्रामीण अर्थशास्त्र पर काम कर रहे हैं। 

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