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नई सरकार, कर्ज माफी के नए वादों ने फिर किसानों में उम्मीद की अलख जगाई

Tue, 14 Mar 2017 09:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लुधियाना(पंजाब)
ब्यूरो/अमर उजाला, लुधियाना(पंजाब) Updated Tue, 14 Mar 2017 09:29 AM IST
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Punjab new congress goverment, punjab farmers new hope
Punjab farmer - फोटो : File Photo
चुनाव आते हैं राजनीतिक दल किसानों के साथ वादे करते हैं और फिर भूल जाते हैं, किसान की जमीनी हकीकत सुधर नहीं पा रही है। नजीजतन पंजाब का अन्नदाता राजनीतिक वादों के भंवर में सिसक रहा है, आर्थिक तंगी आत्महत्या करने को मजबूर कर रही है। फसलों का सही मूल्य नहीं मिल रहा, आलू सड़क पर बिखेरने को मजबूर है, सब्जियों के दाम जमीन पर आ गए, पिछले दो सीजन में कॉटन पर सफेद मक्खी के हमलों ने किसान की दशा बिगाड़ दी। हालत यह है कि आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ रहा है। 
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अब फिर से विधानसभा चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों शिअद, आप एवं कांग्रेस ने किसानों के साथ कर्ज माफी के वादे कर उम्मीद की अलख जगाई है। आप एवं कांगेस ने किसानों से बाकायदा कर्ज माफी के फार्म भी भरवाए गए। चुनाव नतीजे के बाद देखना है कि नई सरकार अपने वादों पर अमल करके कितनी राहत किसानों को दे पाती है, लेकिन यह तय है कि नई सरकार के लिए कृषि प्रधान राज्य पंजाब के किसान बड़ा सिरदर्द साबित होंगे।
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पंजाब के किसान पर कर्ज का बोझ बढ़ कर अस्सी हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है, इसे माफ करना इतना आसान नहीं होगा।  अब देखना है कि नई सरकार चुनौतियों को कैसे पार पाकर किसान के जीवन को बेहतर बना पाती है। हालत यह है कि हरित क्रांति के जरिये देश के अनाज में आत्मनिर्भर बनाने वाला किसान आज खुद संकट में उलझा है। पिछले साढ़े तीन साल में किसान का कर्ज 35 हजार करोड़ से उछल कर अस्सी हजार करोड़  के नजदीक पहुंच गया है। वर्ष 2014-15 में किसान एवं खेत मजदूरों पर 69355 करोड़ का कर्ज था, इनमें संस्थागत लोन 54481 करोड़ एवं साहुकार का कर्ज 12874 करोड़ है। वर्ष 2017 तक यह बढ़ कर अस्सी हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगा।
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पंजाब में कम हो रहे हैं छोटे किसान

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Punjab farmer - फोटो : File Photo
कर्ज के परेशान किसान कर रहे आत्महत्या
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के इकोनामिक्स एवं सोशियोलाजी विभाग के हेड डा. सुखपाल सिंह का कहना है कि वर्ष 2001 से लेकर 2011 तक 6942 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। इस अवधि में हर वर्ष करीब 700 किसानों ने मौत को गले लगाया। किसान आत्महत्या के मामले में पंजाब महाराष्ट्र के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। आत्महत्या करने वाले अस्सी फीसदी किसान छोटे (पांच एकड़ से कम जमीन वाले) या ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसान हैं। औसतन 75 फीसदी किसान कर्ज से परेशानी के चलते अपनी जान देते हैं।

सफेद मक्खी के कारण काटन की पैदावार सिमट कर आधी से भी कम रह गई थी। इसने किसानों का बड़ा नुकसान किया और आत्महत्या का ग्राफ भी बढ़ गया। अब पंजाब में  सालाना करीब 750 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे मामलों में मालवा के संगरूर, मानसा, बठिंडा, लुधियाना, मोगा, बरनाला जिलों की हालत ज्यादा नाजुक है। पीएयू अभी सही आंकड़ों को लेकर स्टडी करा रहा है।

पीएयू के इकोनामिक्स विभाग में प्रो जगरूप सिंह सिद्धू का कहना है कि किसानों की अतिरिक्त आय को बढ़ा कर ही उनकी आर्थिक तंगी को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा फसलों की सटीक मार्केटिंग के भी उपाय करने होंगे।                                                                                                                                                                                
पंजाब में कम हो रहे हैं छोटे किसान
1991 में सूबे में पांच लाख छोटे किसान थे, लेकिन अब कम होकर 3.60 लाख रह गए हैं। देश में 11 करोड़ छोटे किसान थे, अब बढ़ कर 12 करोड़ हो गए हैं। मौजूदा कृषि मॉडल बड़े किसानों को सूट करता है। तभी छोटे किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। पंजाब में कुल  10.53 लाख किसान हैं। छोटे किसानों को कुल सब्सिडी का केवल आठ फीसदी ही मिल पाता है। 3.60 लाख छोटे किसान केवल नौ फीसदी जमीन पर ही खेती करते हैं।

खेती में अग्रणी पंजाब

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पंजाब में पैदा की जा रही प्रमुख फसलों का रकबा 
गेहूं-----35.6 लाख हेक्टेयर
धान---29.57 लाख हेक्टेयर
कॉटन--3.98 लाख हेक्टेयर
मक्की---1.15 लाख हेक्टेयर
गन्ना--94  हजार हेक्टेयर
सरसों--31 हजार हेक्टेयर

खेती में अग्रणी पंजाब 
देश की केवल 1.53 फीसदी जमीन पर पंजाब का किसान राष्ट्र के कुल गेहूं उत्पादन का 17 फीसदी, चावल का 11 फीसदी एवं कॉटन का छह फीसदी पैदा करता है।
विश्व का दो फीसदी चावल, तीन फीसदी गेहूं और एक फीसदी कॉटन पैदा होता है।
सूबे की कुल कृषि जमीन में 99.9 फीसदी पर सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध 
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