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पूस की रात, हलकू का साथ और प्रेमचंद की याद, कुछ ऐसा था नजारा
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 28 Oct 2016 01:20 AM IST
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नाटक ‘पूस की रात’ का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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पंजाब कला भवन के ओपन एयर थिएटर में चल रहे दो दिवसीय थिएटर फेस्टिवल केअंतिम दिन मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित नाटक ‘पूस की रात’ का मंचन किया गया। यह नाटक चंडीगढ़ के मास्क थिएटर ग्रुप के कलाकारों ने दिल्ली की संगीत नाटक अकादमी केसहयोग से पेश किया।
पूस की रात की कहानी एक किसान हलकू और उसके परिवार केआसपास घूमती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक किसान ठंड के महीने में अपने शरीर को एक फटे हुए कपड़े से ढकने की कोशिश करता हैं। किसी तरह से उसकेपास तीन रुपये इकट्ठे हो जाते हैं और वह अपनी खुशी से झूमता हुआ अपनी पत्नी से कहता है अब तो कंबल खरीद ही लूंगा, जिससे ठंडी रात में उसको ओढ़कर अपने खेत पर आने वाले जानवरों की निगरानी कर सकूंगा। इतने मे ही घर केबाहर कर्जदाता हलकू को आवाज देकर कहता है कि तुमने कब से मेरा कर्ज लिया हुआ है।
इसे आज लौट दो, इस बात से हलकू की सारी खुशी रफूचक्कर हो जाती है। वह सोचता है कि यदि तीन रुपये इसे दे दूंगा तो सारी सर्दी ठंड सहनी पड़ेगी। हलकू की पत्नी यह रुपये कर्जदार को देने केहक में नहीं होती। वहीं कर्जदार के हठ करने पर हलकू रुपये उसको दे देता है। इसके बाद हलकू की पत्नी को चिंता सताने लगती है पूस की रात कैसे कटेगी और खेत को पशुओं से कैसे बचाया जा सकेगा।
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पूस की रात की कहानी एक किसान हलकू और उसके परिवार केआसपास घूमती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक किसान ठंड के महीने में अपने शरीर को एक फटे हुए कपड़े से ढकने की कोशिश करता हैं। किसी तरह से उसकेपास तीन रुपये इकट्ठे हो जाते हैं और वह अपनी खुशी से झूमता हुआ अपनी पत्नी से कहता है अब तो कंबल खरीद ही लूंगा, जिससे ठंडी रात में उसको ओढ़कर अपने खेत पर आने वाले जानवरों की निगरानी कर सकूंगा। इतने मे ही घर केबाहर कर्जदाता हलकू को आवाज देकर कहता है कि तुमने कब से मेरा कर्ज लिया हुआ है।
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इसे आज लौट दो, इस बात से हलकू की सारी खुशी रफूचक्कर हो जाती है। वह सोचता है कि यदि तीन रुपये इसे दे दूंगा तो सारी सर्दी ठंड सहनी पड़ेगी। हलकू की पत्नी यह रुपये कर्जदार को देने केहक में नहीं होती। वहीं कर्जदार के हठ करने पर हलकू रुपये उसको दे देता है। इसके बाद हलकू की पत्नी को चिंता सताने लगती है पूस की रात कैसे कटेगी और खेत को पशुओं से कैसे बचाया जा सकेगा।
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नाटक ‘पूस की रात’ का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
मजबूरी मे हलकू रात को ठंड में ठिठुरते हुए अपने खेत में पहुंच जाता है। बार- बार पुराने फटे हुए कपड़े से शरीर का ढकने की कोशिश करता हैं। खाट केनीचे उसका कुत्ता झबरा भी रहता है। ठंड सही नहीं जाने पर हलकू आसपास से पत्ते इकट्ठा कर उसमें लाग लगाकर शरीर को गर्मी देने की कोशिश करता है। कुछ देर की लिए इस गर्मी से आलस आ जाता है और उसकी आंख लग जाती है। कुछ ही देर बाद आवाजें सुनाई देती हैं और उसका कुत्ता भी जोर जोर से भौंकता है।
उसे पता लगता है कि उसके खेत में जानवर घुस गए हैं जो पूरा खेत चर रहे हैं। यह बात जानते हुए भी वह अपने आलस्य के कारण नहीं उठता। सुबह उसकी पत्नी पहुंचकर उसे जगाती है और कहती है कि हम तो बर्बाद हो गए। अब तो मजदूरी करके पेट पालना पड़ेगा। इस पर हलकू कुछ क्षण केलिए प्रसन्न होते हुए कहता है कि अब रात को ठंड में यहां तो नहीं सोना पड़ेगा।
उसे पता लगता है कि उसके खेत में जानवर घुस गए हैं जो पूरा खेत चर रहे हैं। यह बात जानते हुए भी वह अपने आलस्य के कारण नहीं उठता। सुबह उसकी पत्नी पहुंचकर उसे जगाती है और कहती है कि हम तो बर्बाद हो गए। अब तो मजदूरी करके पेट पालना पड़ेगा। इस पर हलकू कुछ क्षण केलिए प्रसन्न होते हुए कहता है कि अब रात को ठंड में यहां तो नहीं सोना पड़ेगा।