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बीसी वर्ग को आय के आधार पर विभाजित करना संविधान के खिलाफ: हाईकोर्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 08 Aug 2018 04:34 PM IST
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एमबीबीएस एडमिशन प्रक्रिया में बीसी वर्ग को दो भागों में विभाजित करने के हरियाणा सरकार के निर्णय को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गैर सांविधानिक करार देते हुए एडमिशन प्रक्रिया खारिज कर नए सिरे से काउंसलिंग के आदेश दिए हैं। इसके चलते प्रदेश में चल रही भर्तियों और एडमिशन प्रोसेस पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। अब बीसी वर्ग में क्लासिफिकेशन न होकर केवल क्रीमीलेयर को ही बाहर रखा जाएगा। रोहतक निवासी निशा ने एडवोकेट पृथ्वी राज यादव के माध्यम से याचिका दाखिल करते हुए हरियाणा सरकार की 17 अगस्त 2016 की नोटिफिकेशन को चुनौती दी थी।
याचिका में कहा गया कि इस नोटिफिकेशन के माध्यम से हरियाणा सरकार ने बीसी वर्ग को आय के आधार पर दो भागों में विभाजित करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय के तहत प्रवेश प्रक्रिया में बीसी वर्ग के उन आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनकी सालाना पारिवारिक आय 3 लाख रुपये से कम है। इसके बाद यदि सीट बचती हैं तो 3 से 6 लाख सालाना पारिवारिक आय वाले आवेदकों को एडमिशन दिया जाएगा। याची ने कहा कि हरियाणा सरकार का यह निर्णय इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में जारी आदेश में स्पष्ट किया था कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण के लाभ को नहीं सीमित किया जा सकता। आर्थिक के साथ सामाजिक पिछड़ापन कारक के रूप में शामिल किया जाना जरूरी है। हालांकि कोर्ट ने क्रीमीलेयर को स्वीकार किया था। इस मामले में सरकार ने क्रीमीलेयर को तो बाहर रखा है, लेकिन 3 लाख से कम वार्षिक आय वाले परिवार के आवेदकों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है जो पूरी तरह से गलत है। हरियाणा सरकार ने कहा कि सरकार को अधिकार है कि वह आरक्षण का लाभ किसे मिले यह निर्धारित कर सके।
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हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को अधिकार है, लेकिन कोर्ट को भी अधिकार है कि वह इसकी समीक्षा कर सके कि निर्णय सही है या गलत। ऐसे में सरकार का यह निर्णय कानून की नजर में गलत है और गैर सांविधानिक है। ऐसे में हाईकोर्ट ने एडमिशन प्रक्रिया में बीसी वर्ग को आय के आधार पर विभाजित किए बिना केवल क्रीमीलेयर का ध्यान रखते हुए नए सिरे से काउंसलिंग कर पूरा करने के आदेश दिए हैं।
कमीशन की दलील खारिज
कमीशन ने क्रीमीलेयर को विभाजित करते हुए दलील दी थी कि सदस्यों ने विभिन्न जिलों मे विजिट की थी और पाया कि बीसी वर्ग में 60 से 70 प्रतिशत लोगों की सालाना आय ढाई लाख रुपये से कम है। ऐसे में इस वर्ग को उठाने के लिए क्लासिफिकेशन जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी डाटा के यह बात नहीं मानी जा सकती। यदि कोई सर्वे होता और आंकड़े मौजूद होते तो बात और थी।
सरकार ने एक हाथ से पिछड़ों को दिया और दूसरे हाथ से वापस ले लिया
कोर्ट ने कहा कि केवल आर्थिक स्थिति सुधरने से यह नहीं माना जा सकता कि पिछड़ापन नहीं है। आर्थिक स्थिति सुधरना सोशल आपलिफ्टमेंट तो है लेकिन इसे पिछड़ापन खत्म होने का पूरा आधार नहीं माना जा सकता। सरकार ने पिछड़ों में से कुछ को अलग कर दिया है और वह भी आर्थिक आधार पर। यह तो सरकार का ऐसा काम है जैसे एक हाथ से पिछड़ों को दिया और दूसरे हाथ से वापस ले लिया।
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याचिका में कहा गया कि इस नोटिफिकेशन के माध्यम से हरियाणा सरकार ने बीसी वर्ग को आय के आधार पर दो भागों में विभाजित करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय के तहत प्रवेश प्रक्रिया में बीसी वर्ग के उन आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनकी सालाना पारिवारिक आय 3 लाख रुपये से कम है। इसके बाद यदि सीट बचती हैं तो 3 से 6 लाख सालाना पारिवारिक आय वाले आवेदकों को एडमिशन दिया जाएगा। याची ने कहा कि हरियाणा सरकार का यह निर्णय इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश के खिलाफ है।
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सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में जारी आदेश में स्पष्ट किया था कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण के लाभ को नहीं सीमित किया जा सकता। आर्थिक के साथ सामाजिक पिछड़ापन कारक के रूप में शामिल किया जाना जरूरी है। हालांकि कोर्ट ने क्रीमीलेयर को स्वीकार किया था। इस मामले में सरकार ने क्रीमीलेयर को तो बाहर रखा है, लेकिन 3 लाख से कम वार्षिक आय वाले परिवार के आवेदकों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है जो पूरी तरह से गलत है। हरियाणा सरकार ने कहा कि सरकार को अधिकार है कि वह आरक्षण का लाभ किसे मिले यह निर्धारित कर सके।
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हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को अधिकार है, लेकिन कोर्ट को भी अधिकार है कि वह इसकी समीक्षा कर सके कि निर्णय सही है या गलत। ऐसे में सरकार का यह निर्णय कानून की नजर में गलत है और गैर सांविधानिक है। ऐसे में हाईकोर्ट ने एडमिशन प्रक्रिया में बीसी वर्ग को आय के आधार पर विभाजित किए बिना केवल क्रीमीलेयर का ध्यान रखते हुए नए सिरे से काउंसलिंग कर पूरा करने के आदेश दिए हैं।
कमीशन की दलील खारिज
कमीशन ने क्रीमीलेयर को विभाजित करते हुए दलील दी थी कि सदस्यों ने विभिन्न जिलों मे विजिट की थी और पाया कि बीसी वर्ग में 60 से 70 प्रतिशत लोगों की सालाना आय ढाई लाख रुपये से कम है। ऐसे में इस वर्ग को उठाने के लिए क्लासिफिकेशन जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी डाटा के यह बात नहीं मानी जा सकती। यदि कोई सर्वे होता और आंकड़े मौजूद होते तो बात और थी।
सरकार ने एक हाथ से पिछड़ों को दिया और दूसरे हाथ से वापस ले लिया
कोर्ट ने कहा कि केवल आर्थिक स्थिति सुधरने से यह नहीं माना जा सकता कि पिछड़ापन नहीं है। आर्थिक स्थिति सुधरना सोशल आपलिफ्टमेंट तो है लेकिन इसे पिछड़ापन खत्म होने का पूरा आधार नहीं माना जा सकता। सरकार ने पिछड़ों में से कुछ को अलग कर दिया है और वह भी आर्थिक आधार पर। यह तो सरकार का ऐसा काम है जैसे एक हाथ से पिछड़ों को दिया और दूसरे हाथ से वापस ले लिया।